खेजडली आन्दोलन : The First Chipko Movement in Hindi

 ∗खेजडली आन्दोलन∗

– Khejarli Aandolan –

 

 

“सिर साटे रुख रहे तो भी सस्तो जाण” और अमृता देवी गुरू जांभोजी महाराज की जय बोलते हुए सबसे पहले पेड़ से लिपट गयी, क्षण भर में उनकी गर्दन काटकर सिर धड़ से अलग कर दिया. फिर तीनों पुत्रियों पेड़ से लिपटी तो उनकी भी गर्दनें काटकर सिर धड़ से अलग कर दिये. ….

 

खेजडली आन्दोलन Khejarli Aandolan के बलिदान की अमर गाथा को शुरु करने से पहले मैं विश्नोई समाज के संस्थापक महान सामाजिक संत गुरू भगवान जम्भेश्वर (जंभोजी) महाराज(1451-1536) को नमन करना करता हूँ. उन्होंने 29 नियम बताये, इन  नियमों का पालन करने वाले जन विश्नोई जन कहलाये. उन्होंने ऐसे विश्नोई समाज का निर्माण किया जो नियमों की पालना में अपने प्राणों बाजी लगा दे !!

 

Chipko Movement in Hindi

शत-शत नमन्

 

आज सारी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण की चिंता में पर्यावरण चेतना के लिये सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर विभिन्न कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. भारतीय जनमानस में पर्यावरण संरक्षण की चेतना और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों की परम्परा सदियों पुरानी है. हमारे धर्मग्रंथ, हमारी सामाजिक कथायें और हमारी जातीय परम्परायें हमें प्रकृति से जोड़ती है. प्रकृति संरक्षण हमारी जीवन शैली में सर्वोच्च् प्राथमिकता का विषय रहा है.

 

चिपको आन्दोलन का अर्थ एवं लक्ष्य : चिपको आन्दोलन का सांकेतिक अर्थ यही है कि पेड़ों को बचाने के लिये पेड़ों से चिपक कर जान दे देना, परन्तु पेड़ों को नहीं काटने देना है. अर्थात प्राणों की आहुति देकर भी पेड़ों की रक्षा करना है. इसी तरह विश्नोई समाज मरते दम तक पेड़ों से चिपक कर उनकी रक्षा सदियों से करता आया है, और कर रहा है. 1730 में खेजड़ली में पेड़ों की रक्षा के लिए विश्नोई समाज ने जो बलिदान दिया है वो मानव इतिहास में अद्वितीय है.

 

Chipko Movement in Hindi 5

 

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वन्य प्राणी सप्ताह

 

प्रकृति संरक्षण के लिये प्राणोत्सर्ग कर देने की घटनाओं ने समूचे विश्व में भारत के प्रकृति प्रेम का परचम फहराया है. अमृता देवी और पर्यावरण रक्षक बिश्नोई समाज की प्रकृति प्रेम की एक घटना हमारे राष्ट्रीय इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठों में अंकित है. सन् 1730 में राजस्थान के जोधपुर राज्य में छोटे से गांव खेजड़ली में घटित घटना का विश्व इतिहास में कोई सानी नहीं है.

 

सन् 1730 में जोधपुर के राजा अभयसिंह को युद्ध से थोड़ा अवकाश मिला तो उन्होंने महल बनवाने का निश्चय किया. नया महल बनाने के कार्य में सबसे पहले चूने का भट्टा जलाने के लिए इंर्धन की आवश्यकता बतायी गयी. राजा ने मंत्री गिरधारी दास  भण्डारी को लकड़ियों की व्यवस्था करने का आदेश दिया, मंत्री गिरधारी दास  भण्डारी  की नजर महल से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित गांव खेजडली पर पड़ी.

 

मंत्री गिरधारी दास भण्डारी व दरबारियों ने मिलकर राजा को सलाह दी कि पड़ोस के गांव खेजड़ली में खेजड़ी के बहुत पेड़ है, वहां से लकड़ी मंगवाने पर चूना पकाने में कोई दिक्कत नहीं होगी. इस पर राजा ने तुरंत अपनी स्वीकृति दे दी. खेजड़ली गांव में अधिकांश बिश्नोई लोग रहते थे. बिश्नोईयों में पर्यावरण के प्रति प्रेम और वन्य जीव सरंक्षण जीवन का प्रमुख उद्देश्य रहा है. खेजड़ली गांव में प्रकृति के प्रति समर्पित इसी बिश्नोई समाज की 42 वर्षीय महिला अमृता देवी के परिवार में उनकी तीन पुत्रियां आसु, रतनी, भागु बाई  और पति रामू खोड़ थे, जो कृषि और पशुपालन से अपना जीवन-यापन करते थे.

 

Chipko Movement in Hindi (2)

 अमृतादेवी बलिदान : एक सच्ची कथा

 

खेजड़ली में राजा के कर्मचारी सबसे पहले अमृता देवी के घर के पास में लगे खेजड़ी के पेड़ को काटने आये तो अमृता देवी ने उन्हें रोका और कहा कि “यह खेजड़ी का पेड़ हमारे घर का सदस्य है यह मेरा भाई है इसे मैंने राखी बांधी है, इसे मैं नहीं काटने दूंगी.” इस पर राजा के कर्मचारियों ने प्रति प्रश्न किया कि “इस पेड़ से तुम्हारा धर्म का रिश्ता है, तो इसकी रक्षा के लिये तुम लोगों की क्या तैयारी है.” इस पर अमृता देवी और गांव के लोगों ने अपना संकल्प घोषित किया “सिर साटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण” अर्थात् हमारा सिर देने के बदले यह पेड़ जिंदा रहता है तो हम इसके लिये तैयार है. उस दिन तो पेड़ कटाई का काम स्थगित कर राजा के कर्मचारी चले गये, लेकिन इस घटना की खबर खेजड़ली और आसपास के गांवों में शीघ्रता से फैल गयी.

 

 कुछ दिन बाद मंगलवार 21 सितम्बर 1730 ई. (भाद्रपद शुक्ल दशमी, विक्रम संवत 1787) को मंत्री गिरधारी दास भण्डारी लावलश्कर के साथ पूरी तैयारी से सूर्योदय होने से पहले आये, जब पूरा गाँव सो रहा था. गिरधारी दास भण्डारी  की पार्टी ने सबसे पहले अमृता देवी के घर के पास में लगे खेजड़ी के हरे पेड़ो की कटाई करना शुरु किया तो, आवाजें सुनकर अमृता देवी अपनी तीनों पुत्रियों के साथ घर से बाहर निकली.

 

उसने ये कृत्य विश्नोई धर्म में वर्जित (प्रतिबंधित) होने के कारण उनका विरोध किया. तब मंत्री गिरधारी दास  भण्डारी की पार्टी ने द्वेषपूर्ण भाव से अमृता देवी को उसके पेड़ छोड़ने के बदले रिश्वत में धन मांगा. उसने उनकी मांग मानने से इन्कार कर दिया और कहा कि ये हमारी धार्मिक मान्यता का तिरस्कार व घोर अपमान है. उसने कहा कि इससे अच्छा तो वह हरे पेड़ो को बचाने के लिये अपनी जान दे देगी. और इसके साथ ही उद्घोष किया  “सिर साटे रुख रहे तो भी सस्तो जाण” और अमृता देवी गुरू जांभोजी महाराज की जय बोलते हुए सबसे पहले पेड़ से लिपट गयी, क्षण भर में उनकी गर्दन काटकर सिर धड़ से अलग कर दिया. फिर तीनों पुत्रियों पेड़ से लिपटी तो उनकी भी गर्दनें काटकर सिर धड़ से अलग कर दिये.

 

यह खबर जगल में आग की तरह फ़ैल गयी. आस-पास के 84 गांवों के लोग आ गये. उन्होनें एक मत से तय कर लिया कि एक पेड़ के एक विश्नोई लिपटकर अपने प्राणों की आहुति देगा. सबसे पहले बुजुर्गों ने प्राणों की आहुति दी. तब मंत्री गिरधारी दास  भण्डारी ने बिश्नोईयों को ताना मारा कि ये अवांच्छित बूढ़े लोगों की बलि दे रहे हो. उसके बाद तो ऐसा जलजला उठा कि बड़े, बूढ़े, जवान, बच्चे स्त्री-पुरुष सबमें प्राणों की बलि देने की होड़ मच गयी.

 

बिश्नोई जन पेड़ो से लिपटते गये और प्राणों की आहुति देते गये. आखिर मंत्री गिरधारी दास भण्डारी को पेड़ो की कटाई रोकनी पड़ी. ये तूफ़ान थमा तब तक कुल 363 बिश्नोईयों (71 महिलायें और 292 पुरूष) ने पेड़ की रक्षा में अपने प्राणों की आहूति दे दी. खेजड़ली की धरती बिश्नोईयों के बलिदानी रक्त से लाल हो गयी. यह मंगलवार 21 सितम्बर 1730 (भाद्रपद शुक्ल दशमी, विक्रम संवत 1787) का ऐतिहासिक दिन विश्व इतिहास में इस अनूठी घटना के लिये हमेशा याद किया जायेगा.

 

 समूचे विश्व में पेड़ रक्षा में अपने प्राणों को उत्सर्ग कर देने की ऐसी कोई दूसरी घटना का विवरण नहीं मिलता है. इस घटना से राजा के मन को गहरा आघात लगा, उन्होंने बिश्नोईयों को ताम्रपत्र से सम्मानित करते हुए जोधपुर राज्य में पेड़ कटाई को प्रतिबंधित घोषित किया और इसके लिये दण्ड का प्रावधान किया. बिश्नोई समाज का यह बलिदानी कार्य आने वाली अनेक शताब्दियों तक पूरी दुनिया में प्रकृति प्रेमियों में नयी प्रेरणा और उत्साह का संचार करता रहेगा. बिश्नोई समाज आज भी अपने गुरू जांभोजी महाराज की 29 नियमों की सीख पर चलकर राजस्थान के रेगिस्तान में खेजड़ी के पेड़ों और वन्यजीवों की रक्षा कर रहा है.

 

Chipko Movement in Hindi

खेजड़ली बलिदान स्मारक

 

मित्रों दिन प्रतिदिन पर्यावरण अनेकानेक कारणों से असंतुलित हो रहा है. ये हमारे लिये तथा आने वाली पीढियों के लिये खतरे की घंटी है. हमे इस सच्ची घटना से सीख लेकर जी-जान से प्रयावरण संतुलन में सहयोग करना चाहिये. मै एक वनाधिकारी होने के नाते भी इसी सहयोग के लिये Request करता हूँ.

 यह पोस्ट 21 सितम्बर अमृतादेवी बेनीवाल शहीद दिवस पर शहीद हुए 363 विश्नोई बन्धुओं का सादर समर्पित करता हूँ.

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