Speech for Education in Hindi : मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है.

∗मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है.∗

(Fundraising Speech for Education 16 June 2013)

Speech for Education in Hindi

“राजन्‌! आप सबने अवश्य बहुमूल्य उपहार दिए हैं किंतु यह सब आपकी संपत्ति का दसवां हिस्सा भी नहीं है.

इसके विपरीत इस बुढ़िया ने अपने मुंह का कौर ही मुझे दे डाला है. भले ही यह बुढ़िया निर्धन है लेकिन इसे संपत्ति की कोई लालसा नहीं है. यही कारण है कि इसका दान मैंने खुले हृदय से, दोनों हाथों से स्वीकार किया है.”

— बुद्धदेव

मैं आज महावीर जाट शिक्षण एवम् शोध संस्थान, फतेहगढ़ (जैसलमेर) के उदघाटन समारोह के पावन पर्व में शामिल होकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ. यहाँ पर आज हमें इस प्रतिष्ठान के उद्घाटन समारोह के साक्षी बनने के साथ-साथ, इसे बहुत आगे तक ले जाने का प्रण लेना है. हमारे द्वारा लिये गये प्रण को ताकत मिले, इसके लिये मैं आपको केवल तीन बातें (Stories) बताऊंगा :

  1. पहली बात, इस संस्था के निर्माण से संबंद्धित है.
  2. दूसरी बात, शिक्षण क्षेत्र में हमारे यहाँ के पुरोधा चौधरी रामदानजी से प्रेरणा की है.
  3. तीसरी बात, दान की महिमा से संबंद्धित है.

ज्यादा कुछ नहीं बोलूंगा.

1.पहली बात (First story),

Speech for Education in Hindi (5)

मेरी पहली बात मेरे इस संस्था से लिंक के संबंद्ध में ही है. मेरा इस क्षेत्र से काफी पुरना नाता रहा है. मैं फतेहगढ़ से 1991 से जुड़ा हुआ हूँ. उस समय शिव (बाड़मेर) में फारेस्ट रेंजर के पद पर कार्यरत था. हमारी कुछ Plantation Sites यहाँ से करीब 7 कि.मी. दूर बरियाड़ा की सरहद में हुआ करती थी. उनमें पौधों को पानी पिलाने के लिये पानी फतेहगढ़ की लोर्डियासर नाडी या ट्यूबवेल से ले जाते थे. उस समय बरियाड़ा के आस पास के क्षेत्र में यंही एक मात्र ट्यूबवेल था. इस तरह यह एरिया हमारी नौकरी का हिस्सा बन जाने के कारण मेरा यहाँ आना जाना लगा रहता था.

फतेहगढ़ में उस समय सड़क के किनारे जीर्ण-शीर्ण अवस्था में गढ़ के आलावा कुछ कच्चे ओरे तथा धूप व वर्षा से बचाव के लिए पोलिथीन के कट्टो तथा मेणियों(पोलीथीन सीट) के छपरे हुआ करते थे. यहाँ के हालात संवत 2047-48 में भी करीब-करीब बाड़मेर के संवत 2025-26 अकाल की याद दिलाते थे. कुलमिलाकर इस क्षेत्र की स्तिथि बहुत भयावह थी.

आज हम जिस शिक्षण संसथान के उद्घाटन लिये यहाँ एकत्रित हुए हैं, इस कार्य के बारे में उस समय सोचना तक मुश्किल था. फिर भी इस कार्य के लिये सर्व श्री महेशारामजी, रेखारामजी सांई, गंगारामजी जाणी, वकील धर्मारामजी सऊ, नाथूरामजी गुजर, चुतरारामजी सऊ आदि कुछ लोग आगे आये. मैं इन सबको सल्यूट करता हूँ. मैंने भी इनके साथ कई बार चर्चाएँ की. परन्तु यह सब हथाई तक ही सिमित रहा, बात आगे नहीं बढ़ी. धीरे-धीरे समय के साथ कुछ तब्दीली आयी. सन्न 2000 तक यहाँ तहसील मुख्यालय बन गया तथा कुछ सरकारी व प्राइवेट भवन, दुकानें आदि बन गये. मंचासीन श्री महेशारामजी सरपंच बन गये. सरपंच साहब का सहयोग भी मिल गया.

इनके निरंतर प्रयासों को देखते हुए भी मेरे मन में एक शंका थी कि इन लोगों ने जो बीड़ा उठाया है, उसके लिये इस रिमोट एरिया में सहयोग करने वाले साथी बहुत मुश्किल से मिलेंगे. परन्तु इस बात की कभी चर्चा न करते हुए इन सबकी हौसला अफजाई करने के लिये हिम्मत करके मैंने 51 हजार रूपये का योगदान किया था. ताकि ये जोश के साथ इस कार्य में आगे बढ़ जावें. उस समय इनके पास न जमीन थी और न ही संस्था का रजिस्ट्रेशन हुआ था.   मैं उन सभी लोगों को एक बार पुन ᱺ साधूवाद देना चाहूँगा जिन्होंने इस कार्य को आज इस मुकाम तक पहुंचाया. बच्चे की परवरिश उसके जन्म बाद ही शुरू होती है. इस संस्था जन्म आज इसके उद्घाटन से हुआ है. अब इसे आगे बढ़ाने व पूर्णता की और ले जाने के लिये हमें हर संभव प्रयास करना है.

2. दूसरी बात (Seond story),

speech for Education in Hindi (3)

इस पावन बेला पर मैं हमारे यंही के शिक्षण क्षेत्र के पुरोधा चौधरी रामदानजी का स्मरण करना चाहूँगा. उन्होंने 80 साल पहले बाड़मेर में किसान छात्रावास की स्थापना की थी. जिसके बारे में सब आप लोग जानते हो. यहाँ मैं केवल इतना ही याद दिलाना चाहूँगा कि, उन्होंने जिस समय यह कार्य किया उस समय हालात बहुत ख़राब व खतरनाक थे. रामदानजी की जीवनी लेखन के सम्बन्ध में मैं एक बार चौहटन विधायक अब्दुल हादीजी से से मिला तब उन्होंने बताया था कि रामदानजी की जान हर वक्त खतरे में रहती थी. उस समय काश्तकार के पास देने के लिए चंदा होता ही नही था. सब-कुछ कणवारये व कुंतारे ले के चले जाते थे. रही-सही कसर लाग-बाग बैठ-बेगार में पूरी जाती थी. शिक्षा के बारे में बिल्कुल जागरूकता नही थी. काश्तकार की धारणा भी यह बन चुकी थी कि उनका बच्चा जन्म से ही कमाना शुरू हो जाता है. पढाई को खोटिपा मानते थे. बच्चों को पढने के लिये भेजते ही नहीं थे. इतने विकट और विपरीत हालात में रामदानजी ने शिक्षा की अलख जगायी थी.

मैं ज्यादा गहराई में न जाकर चौधरी साहब की जीवनी लिखते वक्त एक संस्मरण सामने आया उसको सुनाता हूँ, उससे सारी बात साफ हो जाएगी. मैं जीवनी लेखन के सिलसिले एक बार बाड़मेर के पूर्व जिला प्रमुख लादूराम जी विश्नोई से मिला, तब उनके पास सोनड़ी के चौधरी प्रहलादजी मांजू (विश्नोई) के पोते पेमाराम से मुलाकात हुई. उन्होंने बताया कि, “रामदानजी एक बार हमारी ढाणी मेरे दादा के पास आये थे. वे बच्चों की पढाई पर जोर देकर कहते थे, पढ़-लिख कर हमारे बच्चे भी कल हवाई जहाजें उड़ायेंगे, पुलिस में थानेदार-एस.पी. बनेंगे, फौज में अफसर बनेंगे, कलेक्टर बनेंगे, मास्टर बनेंगे, डॉक्टर-इंजिनियर बनेंगे; सभी सरकारी नौकरियों में हमारे बच्चे होंगे. परन्तु रामदानजी के इस अभियान में उनकी जान को तथा उन्हें सहयोग करने वालों को बहुत खतरा रहता था. शाम को उनको खाना खिलाने के सिट्टे कूट कर बाजरा निकाल रहे थे कि, संयोग से उस समय एक कणवारिया वहां से गुजर रहा था, उसने पूछा कि “इस समय सिट्टे क्यों कूट रहे हो, कौन मेहमान आये हैं?” तो हमको झूठ बोलना पड़ा कि, “मेहमान हमारे तन-गिनायत ही है. उस समय जागीरदारों के बहुत जुल्म थे. अगर उनको पत्ता लग जाता कि किसी ने रामदानजी को अपनी ढाणी में ठहराया है, तो उसके साथ वे बहुत बुरा बर्ताव करते थे. उसकी ढाणी को आग लगवा देते थे. ऊँठ ले के चले जाते थे. बहन-बेटी को उठवा देते थे.” मित्रों उन हालात भी रामदानजी ने शिक्षा का जो बीड़ा उठाया, उसी के परिणाम आज हम देख रहे हैं. आज शिक्षा के लिये चंदा लेना व देना दोनों आसान है. क्यों भाइयों आसान है या नही ? ….हाँ आसान है.

3. तीसरी बात (Third story),

दान की महिमा

मित्रों मैं आज के इस नायाब मौंके पर हमारे एतिहासिक दानवीरों का स्मरण करना तथा दान की महिमा को बताना जरूरी समझता हूँ.   दानवीर कर्ण मध्यान के समय सूर्य की पूजा करते थे. उस समय कोई भी भिक्षुक उनसे जो मांगता था, वो वस्तु उनके जिस हाथ की पहुँच होती, उसी हाथ से दान कर देते थे. वे उस वस्तु को एक हाथ दुसरे हाथ में भी नही लेते थे. उनका मानना था कि हाथ बदलने के दरम्यान कंही मन न बदल जावे. वो दान करने में कभी देरी नहीं करते थे. दानवीर भामाशाह का नाम हम सब जानते हैं. 1576 में हल्दीघाटी के युद्ध में हार के पश्चात महाराणा प्रताप ने निराश होकर गुजरात का रुख कर लिया था. उस समय भामाशाह ने अपनी पूरी संचित सम्पति महाराणा को समर्पित कर उन्हें गुजरात जाने से रोका. ये सब दानवीर संसार में अमर हो गये. दान की महिमा अपरम्पार है.   कोई भी दान छोटा या बड़ा नहीं होता हैं. भगवान बुद्ध का एक बार जब पाटलिपुत्र में शुभागमन हुआ, तो हर व्यक्ति ने अपनी-अपनी सांपत्तिक स्थिति व श्रद्धा के अनुसार उन्हें उपहार दिये. राजा बिंबिसार ने भी कीमती हीरे, मोती और रत्न उन्हें पेश किए. बुद्धदेव ने सबको एक हाथ से सहर्ष स्वीकार किया.

इसके बाद मंत्रियों, सेठों, साहूकारों ने अपने-अपने उपहार उन्हें अर्पित किए और बुद्धदेव ने उन सबको एक हाथ से स्वीकार कर लिया.

इतने में एक बुढ़िया लाठी टेकते हुए वहां आई. बुद्धदेव को प्रणाम कर वह बोली, ‘भगवन्‌, जिस समय आपके आने का समाचार मुझे मिला, उस समय मैं यह अनार खा रही थी. मेरे पास कोई दूसरी चीज न होने के कारण मैं इस अधखाए फल को ही ले आई हूं. यदि आप मेरी इस तुच्छ भेंट स्वीकार करें, तो मैं अहोभाग्य समझूंगी.‘

भगवान बुद्ध ने दोनों हाथ सामने कर वह फल ग्रहण किया. राजा बिंबिसार ने जब यह देखा तो उन्होंने बुद्धदेव से कहा, ‘भगवन्‌, क्षमा करें! एक प्रश्न पूछना चाहता हूं. हम सबने आपको कीमती और बड़े-बड़े उपहार दिए जिन्हें आपने एक हाथ से ग्रहण किया लेकिन इस बुढ़िया द्वारा दिए गए छोटे एवं जूठे फल को आपने दोनों हाथों से ग्रहण किया, ऐसा क्यों?’

यह सुन बुद्धदेव मुस्कराए और बोले, राजन्‌! आप सबने अवश्य बहुमूल्य उपहार दिए हैं किंतु यह सब आपकी संपत्ति का दसवां हिस्सा भी नहीं है.

इसके विपरीत इस बुढ़िया ने अपने मुंह का कौर ही मुझे दे डाला है. भले ही यह बुढ़िया निर्धन है लेकिन इसे संपत्ति की कोई लालसा नहीं है. यही कारण है कि इसका दान मैंने खुले हृदय से, दोनों हाथों से स्वीकार किया है.

मित्रों, कहने का तात्पर्य यह कि दान छोटा-बड़ा नही होता है. और ना ही दान करने में देरी करनी चाहिये. दान देने से जिस सुखद संतोष की प्राप्ति होती है, वैसी संसार में और किसी कार्य से नहीं होती है. मैं अपनी बात बताता हूँ, मैंने करीब दस साल पहले चन्दा दिया था. उन्ही दिनों मैं कोई वपत्ति में फंस जाने के कारण तथा बाद में गंगानगर ट्रांसफर हो जाने की वजह से लम्बे अर्से तक यहाँ आ नही पाया. अभी पांच-छ: महिने पहले मैं यहाँ आया था. तब रेखारामजी सांई, गंगारामजी जाणी, वकील धर्मारामजी सऊ, नाथूरामजी गुजर, चुतरारामजी सऊ से मुलाकात हुई. इन्होंने चर्चा के दौरान बताया कि “आपका 51 हजार का चंदा लोगों को प्रेरित करने में हमारे बहुत काम आया (बे मांरे घणा काम आया ).” इन पांच शब्दों से मुझे जो संतुष्टि मिली वो मुझे 51 करोड़ रुपये से भी नहीं मिलती.

दान की महिमा अपरम्पार है!

हमें यह नहीं सोचना कि हमारे पास कितना है और क्या देना चाहिए. जिससे जो बन पड़ता, श्रद्धानुसार जरूर देवें . तुरन्त देवें. आपके द्वारा दिया गया दान दोनों हाथों से स्वीकार्य होगा. आपके दान से इस संस्था में न जाने कितने बच्चों की सफलता की कहानी लिखी जाएगी. आपका दिया हुआ दान अमर रहेगा. हैली को आवागमन मिटणों तय है, पण दान को अमर रेणों भी तय है. जो भी दान करना है तुरन्त करें.

यहाँ मैं इस बात को रेखांकित करना चाहूँगा कि हमारे वेद-पुराणों के अनुसार दान सुपात्र को ही देना चाहिये ताकि उसका सद्पयोग हो सके. पारदर्शिता बनी रहे. सहयोगार्थियों का विश्वास बना रहे. इसके लिये मेरा एक सुझाव है कि इस संस्था का एकाउंट इटरनेट पर रख लिया जावे. ताकि कोई भी व्यक्ति जब चाहे संस्था के क्रियाकलापों का सत्यापन कर सकता है.

अंत में इस अवसर पर मैं एक वन अधिकारी होने नाते अपनी रोजी के संबंद्ध में आप सभी से करबद्ध निवेदन करता हूँ कि, अधिक से अधिक पौधे लगावें व उनकी देखभाल करें. पेड़ो के साथ-साथ वन्यजीवों की सुरक्षा करें. आदिवासी, भील, जोगी, आदि को वन्यजीवों का शिकार न करने के लिए समझाइस करें. केमिकल के कारण तरह-तरह की बीमारियाँ फेल रही है. वन्यजीव मर रहे हैं. देशी गिद्ध धरती से गायब हो गया है. महामारियां न फेले इसके लिये केमिकल का कम से कम उपयोग करें. पोलिथीन का उपयोग बंद करें. पर्यावरण को शुद्ध रखने में हर संभव सहयोग करें.

एक बार फिर मैं महावीर जाट शिक्षण एवम् शोध संस्थान, फतेहगढ़ के लिये शुभकामना करता हूँ. मुझे इस अवसर पर बुलाया व बोलने मौंका दिया इसके लिए तहे दिल से धन्यवाद. अंत में मुझे बचपन में पढ़ी, रामधारीसिंह दिनकर की कविता वीर की दो पंक्तियाँ याद आती है, जो इस प्रकार है :

है कौन विघ्न ऐसा जग में,

टिक सके आदमी के मग में?

ख़म ठोंक ठेलता है जब नर,

पर्वत के जाते पाव उखड़,

मानव जब जोर लगाता है,

पत्थर पानी बन जाता है।

इस कविता की अंतिम पंक्ति “मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है.“ से मैं बहुत प्रेरित रहा हूँ. आप लोगों के लिये भी मेरा यही संदेश है. (मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है.)

इन्ही शब्दों के साथ मैं मेरी बात विराम देता हूँ.

धन्यवाद ! जय हिन्द !

16 जून 2013

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Speech for Education in Hindi (2)

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मित्रों, इंटरनेट पर शिक्षा के लिए Fundraising speech या अनुदान संचयन पर भाषण की हिंदी में Search करने पर हमें Result शून्य मिला यानि एक भी भाषण हिंदी में लिखा हुआ नहीं मिला. जबकि Englishमें इस विषय पर हजारों भाषण नेट पर उपलब्ध हैं. मुझे इस विषय पर हिन्ही में Speech तैयार करने में बहुत Research व मेहनत करनी पड़ी.

मैंने महावीर जाट शिक्षण एवम् शोध संस्थान, फतेहगढ़ (जैसलमेर) के उदघाटन समारोह पर दिनांक 16.06.2013 को इस संस्था के लिये Fundraising हेतु भाषण दिया था. इस विषय पर मेरा यह पहला भाषण था. समारोह छोटा ही था. इस समारोह के मुख्य अतिथि बाड़मेर-जैसलमेर के माननीय सांसद हरीश चौधरी जी; अध्यक्ष मूलाराम जी, प्रधान, पंचायत समिति जैसलमेर; विशिष्ट अतिथि सर्व श्री वरिष्ठ समाजसेवी आदरणीय खरथाराम जी, समाजसेवी रणवीरसिंह जी थे. आयोजन कर्ताओं ने 5 लाख रुपये चंदा एकत्रित करने का लक्ष्य रखा था. कार्यक्रम के अंत में दानदाताओं के दान की जोड़ की, तो कुल चंदा करीब 20 लाख रुपये हुआ.

इंटरनेट पर हिंदी में लिखित भाषणों की अनुपलब्धता को देखते हुए मैंने इस भाषण को अपने SAHISAMAYBLOG शेयर करने का निर्णय किया. सम्माननीय मंच को संबोधित करने के बाद भाषण दिया गया. भाषण की प्रस्तुति में स्थानीय बोली का भी आवश्यकतानुसार Use किया गया. परन्तु यहाँ लिखित भाषण हिंदी में प्रस्तुत किया गया है. मुझे उम्मीद है यह Speech, Students के लिये निबन्ध व भाषण लेखन में प्रेरणादायक साबित होगा.

शिवाजी जन्म जयंती 19 फ़रवरी व  पुण्य तिथि 3 अप्रैल पर विशेष : शिवाजी की जीवनी

शिवाजी को समाप्त करने के महा-अभियान
  1. अफजल खाँ के नेतृत्व में (1659)
  2. सिद्दी जौहर के नेतृत्व में (1660)
  3. सबसे लम्बा अभियान औरगंजेब के मामा शाइस्ता खाँ के नेतृत्व में (1660-1663)
  4. औरंगजेब के नेतृत्व में आगरा जेल में (1666)
  5. शिवाजी के प्रेरक प्रसंग जरुर पढ़ें.

Speech for Education in Hindi (4)

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