करणी माता | Karni Mata story in Hindi

∗करणी माता∗

– Karni Mata story –

karni mata (2)

“…आपकी बुआ ने, जो कि देवल के गर्भ से अनेक कन्याओं के बाद अबकी बार भतीजा पैदा होने की आशा लगाए बैठी थी, बहुत दुःखी होकर आपको शिला (पत्थर) कहकर पुकारा। उसी समय तर्जना की मुद्रा में विकृत बनी हुई उनकी हथेली यथावत् विकृत (टेढी) ही रह गयी।

।। अथ करणीस्तोत्रम् ।।

karni mata

1.

भक्तिं देवलमेहयोरनुपदं भूमौ नृपोपप्लवं,

संस्मृत्यात्मदयामयं च चरितं या हिंगुलाजा स्वयम् ।

देहं मेहगृहे दधौ सुरुचिरं या देशनोकेश्वरी,

सा देवी करणी त्रिनेत्रगृहिणी भूयाद् दयावर्षिणी ।।1।।

                        जिस माता हिंगुलाजा (हिंगलाज माता) ने मेहोजी एवं देवल के जोड़े में अपने प्रति अगाध भक्ति को जानकर तात्कालिक राजाओं की प्रजारक्षणात्मक कर्त्तव्य से विमुखता व पारस्परिक वैमनस्य पर विचार किया, साथ ही दुष्टों का संहार करके सज्जनों की रक्षा करने वाले अपने चिरन्तन दयामय चरित को ध्यान में रखते हुए कीनिया गोत्रीय चारण श्री मेहोजी के घर उनकी पत्नी देवल के गर्भ से अवतार लिया, तथा जो देशनोक की ईश्वरी हैं, जो करणीमाता के नाम से लोक में विख्यात है, ऐसी भगवती करणी जो सती का अवतार होने के कारण परम्परा से भगवान् शंकर की भी प्रियतमा हैं, वे मुझ सेवक पर कृपा की वृष्टि करें।

    2.

गेहेऽस्मिन् बहुकन्यके पुनरियं कस्माच्छिलैवागते-

त्यामेने भवतीं विषादविषयां वक्रांच या स्वांगुलिम्।

तस्यास्ते जनकस्वसुः करतलं या त्वं व्यधास्सार्जवं

कस्माद् देवलदेहजे! हरसि नो दैव्यं ममानार्जवम्।। 2।।

                        हे माता करणी! आपके अवतरित होने पर आपकी बुआ ने, जो कि देवल के गर्भ से अनेक कन्याओं के बाद अबकी बार भतीजा पैदा होने की आशा लगाए बैठी थी, बहुत दुःखी होकर आपको शिला (पत्थर) कहकर पुकारा। उसी समय तर्जना की मुद्रा में विकृत बनी हुई उनकी हथेली यथावत् विकृत (टेढी) ही रह गयी। आपने उन पर कृपा करके उनकी हथेली को जब वापस ठीक कर दिया था, तो हे देवलात्मजे! मेरे भाग्य में जो टेढापन है, उसे दूर क्यों नहीं कर रही हैं?

3.

द्वित्राभिः करपट्टिकाभिरखिला सेना यया तर्पिता,

शेखाख्यो नृपतिर्यदीयकृपया युद्धे जयं लम्भितः।

नित्यानन्दमयी निसर्गमसृणा संसारतापापहा,

सा देवी दुरितं ममापि शमयेन्मेहात्मजा चारणी।।3।।

            बाल्यावस्था में जिसने राव शेखाजी की सम्पूर्ण सेना को मात्र दो-चार रोटियों के सहारे भोजन कराकर तृप्त कर दिया था तथा जिनकी कृपा से राव शेखाजी की सेना युद्ध में विजयी बनी। नित्य आनन्दस्वरूपा, स्वभाव से सरल तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली वह मेहात्मजा चारणी देवी करणी मेरे दुरित (पाप) को भी शान्त करे।

4.

संसर्पत्यनघां गृहस्थसरणिं दुष्टेन दष्टेऽहिना,

मेहे मोहमुपागते च विकले गेहे करामर्शनैः।

स्वस्थं या भवती चकार पितरं संहृत्य स़द्यो विषम्,

मातर्मेऽपि हरप्रिये हर मनःसन्तापि तत् किल्विषम्।।4।।

            मेहोजी की गृहस्थी बहुत अच्छी चल रही थी, एक दिन अचानक उन्हें सर्प ने डस लिया तथा वे मृतप्रायः हो गये थे, सर्वत्र शोक छा गया था। अचानक आपने अपने हाथ के स्पर्शमात्र से उनके विष को दूर करके मेहोजी को स्वस्थ बना दिया था। अतः हे माँ! हे हर की प्रियतमा माता करणी! मेरे मन को सन्तप्त करने वाले पाप सन्ताप को भी हटाओ।

5.

यत्पादाम्बुजचंचरीकचरितो मण्डोरराजास्पदं,

राठौडान्वयभूषणो रणमलो लेभे सुखं नीतिमान्।

सार्द्धं वर्षशतं मरौ स्वजनुषा लोको यया नन्दितो,

राज्ञां सा कुलदेवता हरतु मे चेतोगतं कल्मषम्।।5।।

            जिस देवी के चरण-कमल में भ्रमर की भाँति प्रीति रखने वाला राठौड़वंश का रत्न रणमल जो कि न्यायप्रिय था, मण्डौर का राजा बनने में सफल हुआ। जिस भगवती ने अपने भौतिक देह से इस मरुधरा को लगभग डेढ सौ वर्षों तक आनन्दित किया तथा जो यहां के राजाओं की कुलदेवी हैं एैसी माता करणी मेरे मनोमालिन्य को दूर करे।

6.

जोधाख्यो रणमल्लसूनुरभजद् यस्याः सदा सन्निधिं,

दुर्गस्यापि यया च तस्य निहिता ह्याद्या शिला पावनी।

भक्तानामभयंकरी प्रवचनैः पीयूषसंवर्षिणी,

माता सा करणी ममापि हरणी स्यादेनसां सर्वदा।।6।।

            मण्डोर के राजा रणमल का सुपुत्र जोधा सदा जिनकी उपासना करता था तथा जिसके दुर्ग की पवित्र आधारशिला आपने रखी। भक्तों को अभयदान देने वाली तथा अपने प्रवचनों से अमृत बरसाने वाली माता करणी मेरे पापों को भी हरती रहें ,अर्थात् मुझे पाप कर्म से दूर रखें।

7.

बीकानेरपुरं यदंघ्रिषरणो बीकानृपोऽस्थापयद्,

यामस्तौद् जगडूवणिग् जलनिधौ दोलायिते पोतके।

मन्दाराधिपतेर्जयाय भवती सैंहीं तनुं याऽऽश्रिता,

देपाचारणगेहिनी भवतु सा देवी दयावाहिनी।।7।।

            जिस देवी के चरणों की सेवा करने के फलस्वरूप राव बीका ने बीकानेर नगर की स्थापना की। समुद्री यात्रा के दौरान जहाज आन्दोलित होने पर जगडू नामक सेठ ने जिस देवी को याद किया तथा जिसने मन्दार के राजा को युद्ध में विजय दलाने हेतु सिंहिनी का रूप धारण किया, वह देवी करणी जो कि सांसारिक दृष्टि से देपाजी चारण की पत्नी बनी थी, मुझ पर कृपा करें।

8.

दुर्दान्तं खलु कामरानयवनं बीकानृपो जैतसी,

र्देवीं यामवलम्ब्य मेहतनयां युद्धे पराभूतवान्।

धन्यष्चाथ यया कृतः स्वजनुषा ग्रामः सुवापाभिधः,

सा मां राजकुलेश्वरी भवनिधेः पारं नयेच्छंकरी।।8।।

       मेहोजी की पुत्री जिस माँ करणी की शरण लेकर बीकानेर के शासक जैतसिंह ने दुर्दान्त यवन कामरानखाँ को युद्ध में परास्त किया और जिस देवी ने सुवाप नामक ग्राम में जन्म लेकर उसे धन्य किया। वह कल्याणकारिणी राजकुलेश्वरी देवी करणी मुझे इस संसार सागर से पार करे।

9.

पापान्धो ह्यवरंगजीवहतको दिल्लीपतिर्यं नृपं,

हन्तुं मन्त्रितवाँस्तदा स भवतीं श्रीकर्णसिंहोऽस्मरत्।

चेतस्तस्य विमृज्य रक्षितवती प्राणाँष्च तत्प्रत्ययम्,

मातस्तेऽर्पितमानसो भवति नो को वा कृपाभाजनः।। 9।।

     एक बार जब दिल्ली के अन्यायी शासक औरंगजेब ने आपके श्क्त राजा कर्णसिंह को मारने की योजना बनायी जिसका पता चलने पर कर्णसिंह ने आपका स्मरण किया। आपने उस अत्याचारी का मानस बदल दिया, जिससे राजा के प्राणों के साथ-साथ आपके प्रति उसके विश्वास की भी रक्षा हुई। हे माँ! संसार में ऐसा कौन है? जिसने आपको अपना सर्वस्व मान रखा हो तथा आपकी कृपा का पात्र न हुआ हो? अर्थात् आपके प्रति समर्पित भाव वाला आपकी कृपा का पात्र अवश्य ही होता है।

10.

गंगासिंहनृपस्स विश्वसमरे शूराग्रगण्यो यदा,

देशाद् दूरतरं विदेशमगमच्छत्रून् दृढन्त्रासयन्।

 सम्प्राप्तः सहसासुसंशयमसौ त्रातस्त्वयैवाम्बिके,

भक्त्याप्लावितचेतसां हि विपदो माता हिनस्ति स्वयम्।।10।।

            शूराग्रगण्य महाराज गंगासिंह प्रथम विष्वयुद्ध के दौरान विदेश में शत्रुओं से लौहा लेते हुए एक बार जब विपत्ति में फंस गये थे। उस समय उनके प्राण संकट में आ गए थे, जो आपकी कृपा से ही बच सके थे। हे दययामयी माँ करणी! जिनका चित्त आपकी भक्ति से आप्लावित (भरा हुआ) हो,उनकी विपत्ति को आप स्वयं ही दूर कर देती हैं।

11.

लोकाचारवशंवदा परिणयं स्वीकृत्य या साठिकाम्,

पत्युग्र्राममुपेत्य शंसितवती स्वं ब्रह्मचर्यव्रतम्।

स्वस्थाने च निजानुजां कृतवती वव्राज देशान्तरं,

देवी धेनुहितावहा प्रतिपदं सा वो भवेच्छ्रेयसे।।11।।

       लोक परम्परा का पालन करते हुए आपने परिणय संस्कार स्वीकार किया, किन्तु यथाविधि ससुराल (साठिका गाँव) पहुंचने के बाद आपने अपने पति श्री देपाजी को अपनी ब्रह्मचर्यव्रत-पालन करने की प्रतिज्ञा से अवगत कराया तथा अपनी छोटी बहिन का विवाह श्री देपाजी से करवाकर स्वयं गायों को लेकर देशान्तर (जांगडू प्रदेश) में रहने लगी। गोरक्षिका एवं गोवंश का भला करने वाली वह माँ आप सबका कल्याण करे।

12.

दृष्ट्वा धेनुशतं हि यौतुकमयं कूपे च तोयाल्पताम्,

ग्राम्यास्ते भवतीमबोधविकलाः प्राहुर्यदा दुर्वचः।

रोषाच्छुष्कमवेक्ष्य कूपमभजन् यत्पादपद्मे रतिं,

तुष्टा तेष्वपि या बभूव वरदा तस्यै करण्यै नमः।।12।।

   आपके पिता ने आपके विवाह में दहेजस्वरूप सैंकडों गायें दी। ससुराल पहुंचने पर वहां के अबोध लोगों ने आपके स्वरूप को नहीं जानने के कारण आपकी गायों को अपने कुएँ पर पानी पिलाने से मना कर दिया तथा बहुत कुछ अकथनीय भी कहा। जिससे कुपित होकर आपने उनके एक मात्र कुएँ को सुखा दिया। इस घटना से घबराकर जब उन लोगों ने आपकी स्तुति की, तो प्रसन्न होकर काम चलाऊ पानी का संचार पुनः होने का वरदान दिया था। जो देवी ऐसे दुर्वचन कहने वालों पर भी प्रसन्न हो सकती हैं, ऐसी माँ करणी को मैं प्रणाम करता हूं।

13.

आकर्ण्य द्रुणदंशदुःखविकलं या बालिकाक्रन्दनं,

साठीकां श्वशुरालयं कृतवती त्वं द्रागभूमिं भियाम्।

क्षेत्रं तत् परिपालयन्निव वचस्तेऽद्यापि निर्वृश्चिकं,

नाधत्सेऽम्ब! कथं सदार्दति कृपां तापत्रयत्रासिते।।13।।

     जिस देवी ने अपने ससुराल (साठिका गांव) में जाते ही किसी बालिका को बिच्छु के डंक मारने से बिलखती हुई जानकर उस गाँव को बिच्छुओं के भय से मुक्त कर दिया। वह क्षेत्र आपके उस वचन का पालन आज भी कर रहा है। वहां आज भी बिच्छुओं का पूर्णतः अभाव है। इसलिए हे माता! त्रिविध ताप (आधिभौतिक,आधिदैविक एवं आध्यात्मिक दुःखों ) से त्रस्त होकर सदा आर्त पुकार करते हुए इस भक्त पर कृपा क्यों नहीं कर रही हैं? अर्थात् मुझ पर भी तो कृपा करें।

14.

यस्त्वां जालतडागमागतवतीं दर्पोष्मवाग्ग्रामणीः,

कान्हाः स्वाश्विकशस्यमोषणपरां मत्वा न्यषेधीद् वृथा।

उन्मत्तो न शशाम सामवचसा स्वेनांहसाऽसौ हतः,

को वा कोपकृशानुदीपितदिशस्ते स्याच्चिरं सम्मुखे।।14।।

     जब आप गायों को लेकर जांगळू प्रदेश में जाल नामक वनस्पति बहुल जोहड़ में पहुंचकर रहने लगी तो वहां के शासक कान्हा को यह बात असहनीय हो गयी। चूंकि वह जोहड़ उसके घोड़ों का चारागाह था। अतः उसने आपको अकथनीय दुर्वचन कहकर वहां से निकालना चाहा, किन्तु स्वार्थवश उन्मत्त बना हुआ वह आपके नीतिपरक शान्तिपूर्ण वचनों से भी जब शान्त नहीं हुआ, तो पापी वह कान्हा अपने ही पाप के कारण आपके वाहन सिंह के द्वारा मृत्युमुख को प्राप्त हो गया। हे माँ! इस संसार में ऐसा कौन है? जो क्रोधाग्नि से दिशाओं को प्रकाशित कर देने वाली आपके सम्मुख शत्रुरूप में ठहर सकता हो? निश्चित ही कोई नहीं।

15.

नैषा जालततिर्हिताय भविता योष्ट्रप्रिया केवलम्,

भूयाद् गव्यकुटाटवीति सहसा संकल्पमात्रेण या।

जालान् जाङ्गलुदेशजान् हि बदरीरूपान् समापादयत्,

सा माता जनतामनोगतमघस्सङ्घं हरेच्चारणी ।।15।।

     हे माँ जब आपने जांगळू प्रदेश के उस जालों से आच्छन्न अरण्य को देखकर यह सोचा कि इस भूमि पर ये जाल जो केवल ऊँटों के लिए हितकर हैं, गोवंश को इनसे कोई लाभ नहीं है। यदि इनके स्थान पर कोई ऐसी वनस्पति होती, जो ऊँटों के साथ-साथ गायों को भी पुष्टि प्रदान करती, तो अच्छा होता। बस आपके इस संकल्प मात्र से ही वे सारे जालवृक्ष तत्काल झाडि़यां बन गये। ऐसी वह देवी माँ चारणी सभी लोगों के पाप समूह का हरण करे।

16.

राठौडं वृणुयात् पतिं नृपवरं रंगाभिधा ते सुता,

ह्येवं पूगलबीकयोर्जनतयोः स्यात् सौहृदं शाश्वतम्।

इत्युक्तोऽपि न यः पपाल सुवचश्शेखाजिरावस्त्वया,

कारायाः स विमोचितः कथमहं नाद्यापि ते सेवकः?।।16।।

            हे माता ! एक बार आपने अपने भक्त राव शेखाजी को उनकी पुत्री रंग कँवर का विवाह बीकानेर के राजा बीकाजी राठौड के साथ करने का आदेश दिया था, किन्तु शेखाजी ने उसे ठुकरा दिया था। शीघ्र ही मुलतान के राजा के साथ युद्ध में पराजित होने पर उन्हें कारागार में डाल दिया गया। ऐसी स्थिति में आपने चिल्ल(चील) का रूप धारण करके उन्हें कारावास से उठा कर पूगलगढ पहुंचा दिया, तो फिर मुझ सेवक को भी तो मुक्ति प्रदान करो।

17.

आनन्दस्तु तवैकनामजपनाल्लेभे तवैवाभिधां,

कूपात्काष्ठजबन्धबन्धविरतो निस्सार्यमाणो बहिः।

मध्येकूपवरत्रभंगविकलो यस्त्वां जजापाम्बिके!,

व्यालीभूय स रक्षितो जननि! ते नाम्नः स्फुटं तत्फलम्।।17।।

   आनन्द नामक आपका भक्त, जो निरन्तर आपके नाम का जप करता रहता था, अतः लोगों ने उसका नाम करणा ही रख दिया। एक दिन वह आऊ नामक गाँव के कूएँ में जमोट बान्धने के बाद बाहर निकाला जा रहा था। अचानक वरत्र (मोटी रस्सी जिसे लाव कहते हैं) टूट गयी। आनन्द ने आपको याद किया। आपने तत्काल दुम्ही (दुमुही) नामक सर्प का रूप धारण करके टूटी हुई उस वरत्र के दोनों किनारों को मुख और पूँछ से पकड़ लिया। जिससे वह सुरक्षित बाहर आ गया। हे माता! यह सब आपके नाम की महिमा का ही प्रत्यक्ष फल है।

18.

ज्ञात्वा क्षात्रवधूं नवोढमुरगघ्राणाहतं स्वामिनं,

लोकँल्लोकमनन्तशोकजलधौ हृद्द्राविसंराविणीम्।

बन्धालां निकषा त्वया स तरुणः प्राणैः पुनर्योजितो,

भूयस्त्वच्चरणौ पुपूज सुकृती माया ह्यनन्तास्ति ते।।18।।

     एक बार कोई नवविवाहित क्षत्रिय दम्पती यात्रा करते हुए बन्धाला नामक गाँव के समीप रात्रि विश्राम के लिए रुके थे। रात में सोते हुए पुरुष को पीवणा नामक साँप पी गया,जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। संयोगवश प्रातःकाल आप उधर से गुजर रही थी। आपने उस नवोढा क्षत्रिय युवती को उस स्थिति में देखकर, जो कि अपने मृत पति को देख-देख कर अनन्त शोकसागर में हृदयविदारक रुदन कर रही थी, उस मृत तरुण को तुरन्त पुनर्जीवित कर दिया। सुकृती वह क्षत्रिय युवक आपकी चरण वन्दना करने लगा। हे जगज्जननी! आपकी महिमा अनन्त है।

19.

यवनरचितकुचक्रान्मोचितो यः करण्या,

गज इव मकरास्यात् कर्णसिंहश्शरण्यः।

पदजलजरजोभिः पाविते देवि! देशे,

तव सदनमकार्षीदद्भुतं देशनोके।।19।।

     माता करणी! आपने शरणयोग्य अपने जिस भक्त राजा कर्णसिंह को यवनों के कुचक्र से मगरमच्छ के मुख से गजराज की तरह मुक्त कराया था, हे माता! आपके उस भक्त कर्णसिंह ने आपके चरणरज से परम पवित्र स्थल देशनोक में आपका अतिसुन्दर मन्दिर बनवाया।

20

तव चरितमुदात्तं श्रद्धया संस्मरन्तः,

प्रतिदिनमुपगम्योपासका देशनोकम्।

विमलमतिजुषो वै सिद्धदण्डप्रणामा,

निजमभिलषितं ये नाधिगच्छन्ति ते के?।। 20 ।।

            हे माँ! आपके उदात्त चरित को स्मरण करते हुए आपके उपासक देशनोक की यात्रा करते हैं। परिशुद्ध बुद्धिवाले वे जो आपके सम्मुख दण्डवत् प्रणाम प्रस्तुत करते हैं, उनमें ऐसे कितने हैं, जिनकी मनःकामना पूरी न होती हों? अभिप्राय यह है कि विशुद्ध भाव से आपके प्रति समर्पित सभी आराधकों की अभिलाषाएं अवष्य पूरी होती हैं।

21.

स्तवमिदं करणीचरिताद्भुतम्, पठति योऽनुदिनं शुचिमानसः।

श्रियमवाप्य शतायुरनामयः, स्यति पुनः स पुनर्भवजम्भयम्।। 21।।

     माता करणी के चरित का वर्णन होने से अद्भुत इस स्तोत्र का शुद्धचित्त होकर जो व्यक्ति प्रतिदिन पाठ करेगा, वह विपुल धनधान्य से सम्पन्न, नीरोग तथा दीर्घायु होगा एवं वह पुनः पुनः जन्म मरण के भय से भी मुक्त होकर माता के परम धाम को प्राप्त होगा।

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       –  ।। इति श्रीसत्यनारायणशर्मविरचितं करणीस्तोत्रम् सम्पूर्णम्।। –

I have received this KARNI MATA post from Dr S. N. Sankholiya Principal G S College, Salasar Balaji. Thanks a lot Dr S. N. Sankholiya for giving such a intellectual & own created KARNI MATA aarti in Sanskrit.

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