Appiko Movement in Hindi | अप्पिको आन्दोलन

∗Appiko Chaluvali अप्पिको चालुवाली∗

– Appiko Movement –

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पांडूरंग हेगडे व सुन्दरलाल बहुगुणा.

Appiko Movement के पीछे का मुख्य कारण पश्चिमी घाटों में अति संवेदनशील उष्णकटिबंधीय वनों की मिक्स्ड कल्चर (Mixed culture) को मोनो कल्चर (Mono culture) में बदलना है.

“Ecology is permanent economy.”

(“पारिस्थितिकी ही स्थायी अर्थव्यवस्था है.”)

“To save, to grow and to use rationally.”

(“सुसु, बेलेसु और बालसु.”)

– Appiko movement के नारे

Appiko Movement का सांकेतिक अर्थ :

चिपको आन्दोलन को कन्नड़ भाषा में Appiko Chaluvali (अप्पिको चालुवाली) कहते  हैं. अप्पिको आन्दोलन पर्यावरण संरक्षण के लिये चलाया गया एक क्रांतिकारी आन्दोलन है. अप्पिको (Appiko) कन्नड़ भाषा का शब्द जिसका हिन्दी में रूपान्तरण चिपको यानी गले लगाना तथा अंग्रेजी में Hugging है. तीनों शब्दों का यहाँ तात्पर्य पेड़ों से गले लगकर या चिपककर उनकी रक्षा करना है.

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हिमालय में उत्तराखण्ड के चिपको आन्दोलन से इस आन्दोलन को प्रेरणा मिली. चिपको आन्दोलन जैसा ही अप्पिको आन्दोलन कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ा जिले में 1983 में वनों की सुरक्षा के लिए पांडूरंग हेगडे (Panduranga Hegde) के नेतृत्व में चलाया गया.

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अप्पिको आन्दोलन की भूमिका :

दक्षिण भारत उष्ण कटिबंधीय पारिस्थितिकी तन्त्र (tropical forest ecosystem) का घर है. यह Ecosystem बहुत नाजुक है. वनों की कीमत पर ‘विकास’ (अधिक छेड़छाड़) के कारण यह यह तंत्र बिल्कुल नष्ट होने की कागार पर आ गया. उत्तर कन्नड़ा जिले का 1950 में 81% क्षेत्र वनों में आच्छादित था. ‘विकास’ के कारण 1980 में वनक्षेत्र 25% रह गया. केरल में 1950 से 1984 तक हालत ये हुए कि 44% वन क्षेत्र सिकुड़कर 9% रह गये. इसके अलावा कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ा जिले के वनवासियों ने 1831 व 1930 में वन क्षेत्रों में अपने हक-हकूक (Stakeholder forest rights) के लिए किये आन्दोलनों से उस समय की हुकूमत को हिला के रख दिया था.

राजस्थान में खेजड़ली आन्दोलन में पेड़ो की रक्षा के लिए 363 लोगों ने प्राणों का बलिदान दिया. हिमालय में उत्तराखंड के वनों के संरक्षण के लिए चिपको आन्दोलन को बहुत लम्बे संघर्ष से बाद सफलता मिली. पूर्वजों के संघर्ष व बलिदान का इतिहास, आगे की पीढी के लिए संघर्ष की प्रेरणा बनने के साथ उनकी राह को आसान करता है. चिपको आन्दोलन की सफलता से प्रेरित होकर वनों की सुरक्षा के लिए कर्नाटक में अप्पिको (Appiko) आन्दोलन पांडूरंग हेगडे (Panduranga Hegde) के नेतृत्व में शुरू हुआ.

अप्पिको आन्दोलन की पृष्ठभूमि :

उत्तर कन्नड़ा जिले में 1950 में 81% क्षेत्र वनों में आच्छादित था. सरकार ने इस वनांचल जिले को पिछड़ा (Backward) जिला घोषित कर ‘विकास’ शुरू कर दिया.

यहां विकास के लिये मुख्यत: तीन उद्योग लगाये गये :

  1. Pulp & paper mill
  2. Plywood Factory
  3. Power के लिए पनबिजली प्रोजेक्ट. (इसके लिए नदियों पर बांधो की एक सिरिज बनानी चालू कर दी.)

उक्त महत्वाकांक्षी ‘विकास’ के लिये पहले दो उद्योगों के लिये वनों से पेड़ों का लगभग खात्मा कर दिया और तीसरे प्रोजेक्ट के लिये नदियों पर बनाये गये बांधों के कारण वनों एंव कृषि का बहुत बड़ा क्षेत्र पानी के भराव में आ गया. जिससे 1980 आते आते वनों का क्षेत्रफल 81% से सिकुड़ कर 25% रह गया. स्थानीय लोगों को बांधों के कारण विस्थापित कर दिया गया. वनों में वृक्षों की मिश्रित प्रजातियों की जगह यूकेलिप्टस व सागवान का वृक्षारोपण किया गया. जिनसे पानी के श्रोत सूख गये. बांधों से नदियाँ मृत्त प्राय: हो गयी. इस पूरी कारस्तानी उर्फ ‘तथाकथित विकास’ ने वनवासियों को उजाड़कर रख दिया.

अगर संक्षेप में कहा जाय तो विकास के लिये जो मुख्य तीन P’s – paper plywood और power आये जिनके परिणाम स्वरूप चौथा P निकला जो है Poverty.

कुलमिलाकर 1980 आते-आते तथाकथित विकास से Appiko आन्दोलन की पृष्ट भूमि तैयार चुकी थी.

अप्पिको आन्दोलन की नौबत (Stage) क्यों आयी?

जनता में जलजला उठे बिना आन्दोलन नहीं होते हैं. Appiko आन्दोलन के पीछे का मुख्य कारण पश्चिमी घाटों में अति संवेदनशील उष्णकटिबंधीय वनों की मिक्स्ड कल्चर (Mixed culture) को मोनो कल्चर (Mono culture) में बदलना है. इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं.

‘विकास’ से पूर्व जैवविविधता (Biodiversity) :

विकास से पहले पश्चिमी घाट में इन वनों में पेड़ों व अन्य जीवों की प्रजातियाँ:

  • पौधो की प्रजातियां – 1,20,000
  • फूल वाले पौधें की प्रजातियां – 4500
  • औषधीय पौधों की प्रजातियां – 1493
  • मेंढक की प्रजातियां – 70
  • मछली की प्रजातियां – 800
  • पक्षियों की प्रजातियां – 500
  • रेपटाइलस् की प्रजातियां – 160
  • मेमलस् की प्रजातियां – 120
  • मधुमखियाँ आदि आदि

‘विकास’ से बाद जैवविविधता (Biodiversity) :

विकास के लिए वनस्पति को काटने के बाद वनों में वृक्षों की मिश्रित प्रजातियों की जगह यूकेलिप्टस  व सागवान का मोनो कल्चर वृक्षारोपण (यानी एक ही प्रजाति के पौधे लगाना) किया गया. जंगली जीव-जंतु मर गए या बचे-कुचे खेतों में आ गए.

इस मोनो कल्चर के परिणाम स्वरूप पूरा क्षेत्र यूपेटोरियम (Eupatorium) नाम की खरपतवार से भर गया. पानी के श्रोत सूख गये. उक्त जैव विविधता के नष्ट होने से कृषि चोपट होने के साथ – साथ लोगों को Fodder, Fuelwook, fruit, food, Fertilizer, Honey, Fiber Timber (कृषि के औजार बनाने वाले पेड़) सब कुछ नष्ट हो गया.

1980 तक स्तिथि ये हो गयी थी कि, अवशेष बचे वनों को बचाये बिना उस क्षेत्र के लोगों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया था.

Appko आंदोलन 1983 :

8 सितम्बर 1983 में पांडूरंग हेगडे के नेतृत्व में सालकनी गांव के लोगों, पुरूषों, महिलाओं व बच्चों ने पेड़ों से लिपटकर कालासी वन (Kalase forest) क्षेत्र में पांडूरंग हेगडे (Panduranga Hegde) के नेतृत्व में आरम्भ किया. इससे दक्षिण भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिये एक नयी जागरूकता पैदा हुई.

       Appiko आंदोलन की कुछ घटनाएं :

  • 08.09.1983 की घटना : सितम्बर 1983 में सालकनी से 8 किलोमीटर दूर कुडेरगोड (kudergod) वन खण्ड में वन विभाग से ठेकेदार (contractor) को Clear Felling (100% पेड़ों की कटाई) के आदेश दिये. ठेकेदार के लोग कुल्हाड़ियाँ जंगल में गए, तब सालकनी (Salkani) के कुछ जागरूक लोगों ने Appiko आंदोलन के कार्यकर्त्ताओं को बुलाकर ग्रामीणों के साथ मिटिंग की. और 08.09.1983 को 200 लोग, महिलायें पुरूष व बच्चों ने पांडूरंग हेगडे (Panduranga Hegde) के नेतृत्व में 8 किलोमीटर पहाड़ी क्षेत्र में ट्रेकिंग कर उस वन खण्ड में पहुंचे और पेड़ो से लिपटकर कटाई को रोका. 29.09.1983 को पुनः कटाई चालू करने पर फिर इसी प्रकार रोका. आखिर ठेकेदार ने 14.10.1983 को वह क्षेत्र छोड़ दिया.
  • 16.10.1983 को सालकनी से 40 किलोमीटर दूर बेनगांव (Bengaon) वन क्षेत्र में 60 वनवासियों ने स्वंप्रेरित (spontaneous) होकर Appiko आंदोलन का मार्ग अपनाया और पेड़ों से लिपटकर पेड़ों को बचाया. 18.10.1983 को 150 लोग बाहर से आकर इनके समर्थन में खड़े हो गये.
  • 23.10.1983 को हुसरी (Husri) वन क्षेत्र में 200 लोगों ने Appiko आंदोलन की राह अपना कर पेड़ों को बचाया.
  • 11.11.1983 को निदगोड (Nidgod) वन क्षेत्र में 300 लोगों ने Appiko आंदोलन अपना कर पेड़ों को बचाया.
  • 12.11.1983 को केलागिन जाड्डी वन क्षेत्रों (Kelagin Jaddi forest) में 51 Marked पेड़ों के काटान में 542 पेड़ों को नष्ट करने के कारण Appiko आंदोलनकारी शेष पदों को बचने के लिए खड़े हो गये.
  • 25.11.1983 को पारसी (Parasi) वनक्षेत्र में 300. लोगों ने Appiko आंदोलन चलाकर पेड़ों को बचाया.
  • 11.12.1983 को बिलगल (Bilgal) फोरेस्ट 201 लोग (जिसमें 100 महिलाओं) ने मिलकर Appiko आंदोलन अपनाकर पेड़ों को बचाया.

इस प्रकार Appko आंदोलन स्वत:स्फूर्त होकर तमिलनाडु के पूर्वी घाटों से गोवा तक पूरे दक्षिण भारत में फैल गया.

हुसरी (Husri) Appiko आन्दोलन प्रकरण की पड़ताल (A Case study) :

हुसरी 45 परिवारों का छोटा-सा गांव था. सबका जीवन निर्वाह खेती पर निर्भर था. जिनमें अधिकत्तर परिवारों के पास खेती करने लायक बहुत ही कम जमीन थी. ये सब अपनी खेती के लिये खाद की व्यवस्था भी वन से पुरानी पत्तियों के कचरे (leaf-litter) से करते थे. इनको सबसे बड़ा झटका 1969 में तब लगा जब इनके गांव के पास यूकेलिप्टस् के वृक्षारोपण (Plantation) हेतु 900 एकड़ वन क्षेत्र का सफाया कर दिया गया. इससे इनको खाद व ईंधन मिलना बन्द हो गया. कृषि के औजार के लिये लकड़ी मुश्किल से मिलती. शहद, औषधियों आदि के लिये वनस्पत्ति का अंत हो गया. अनियमित वर्षा के कारण कृषि उत्पादन में कमी आ गयी.

अक्टूबर 1983 को वन विभाग ने कटान के लिये हुसरी के नजदीक का एक वन खण्ड (patch) फिर ठेके पर दिया. पर इस बार जब ठेकेदार के लोग कुल्हाड़ियाँ जंगल में गए, तब गांव के कुछ जागरूक लोगों ने Appiko कार्यकर्त्ताओं बुलाया व उनकी गांव वालों के साथ मिटिंग करवायी. सबने सर्व सम्मत्ति से Appiko के  जरिये, यानी पेड़ों को गले लगाकर, उनको बचाने का निर्णय किया. अगले दिन 23 अक्टूबर 1983 को सुबह 200 लोग महिलायें, पुरूष व बच्चे कटान वाले वन क्षेत्र की ओर कूच कर दिया.

उस वन खण्ड में पहुँच कर पेड़ों से चिपक गये और कटान बन्द करवा दिया. ठेकेदार ने वन विभाग के डी0एफ0ओ0 से सम्पर्क किया और उसे उस क्षेत्र में लेकर आया. डी0एफ0ओ0 ने लोगों के साथ बैठकर विचार-विमर्श किया. उसने घोषणा की कि सिरसी (Sirsi) कस्बे के लिए लकड़ी की जरूरत पूरी करने के लिये यह कटान करना ही पड़ेगा. लोगों ने कहा, “यहां पड़ों की कटाई के बाद हमारे लिये कृषि के औजार बनाने के लिये लकड़ी व खेतों के लिये खाद नहीं रहेगी, हम कहां जायेगें?” DFO ने बताया कि हम तुरन्त नया वृक्षारोपण (Plantation) कर देगें. लोगों ने सवाल किया, “आप युकेलिप्टस् और सागवान का वृक्षारोपण करते हो जिनसे हमें चारा व खाद नहीं मिलते हैं.” इस तरह वार्तालाप जारी रहा, अंत में डी0एफ0ओ0 ने इस कटान को रोकने में असमर्थता जताई. लोगों ने कह दिया कि हम पेड़ों से चिपक कर उनका बचाव करेगें.

कुछ लोग डी0एफ0ओ0 का ‘घेराव’ करना चाहते थे, लेकिन आंदोलन के संचालकों ने ऐसी बलपूर्वक कार्यवाही की निरर्थकता को समझाया. उन्होने कहा, “इस तरह ‘घेराव’ करके हम पुलिस को बदले की कार्यवाही का न्यौंता देंगें. इससे हिंसा भड़क सकती है, हमें इस अफसर को तंग करने के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा. हमारे Appiko आंदोलन का मकसद वन नीति (Forest Policy) मे बदलाव कराना है, जो इस एक व्यक्ति के हाथ में नहीं हैं अच्छा होगा कि, हम इसे उच्च अधिकारियों व वनमन्त्री को यहां के हालात के बारे में अवगत कराने का निवेदन करें.’’ लोग-बाग इस सुझाव से सहमत हो गये तथा सबने अफसर से निवेदन किया कि हमारे प्रकरण (Case) को उच्चाधिकारियों व वनमन्त्री तक पहुंचाया जावे. इस प्रकार निर्णायक मोड़ पर Appiko कार्यकर्त्ताओं के हस्तक्षेप से एक हिंसात्मक विवाद टल गया. लोग इस बात को समझ गये कि यह अफसर भी इंसान है जो पूरे तन्त्र का एक हिस्सा मात्र है. उन्होंने उसके दृष्टिकोण को बदल कर अपने सुझावों को स्वीकार करने के लिये मना लिया.

अहिंसात्मक (non-violent) दृष्टिकोण Appiko आंदोलन को बहुत बड़ी सफलता दिलाने में मददगार साबित हुआ. पूरे स्टेट का ध्यान आन्दोलन की तरफ गया और समर्थन भी हासिल किया. राज्य सरकार ने अन्ततोगत्वा वनमन्त्री को वहां की स्थिति का जायजा लेने भेजा.

दिसम्बर 1983 तक उत्तर कनड़ा जिले के विशेषकर आठ वन खण्डों में अप्पिको आंदोलन फैल चुका था. आन्दोलन को भारी जन समर्थन मिला. लगभग सभी समाचार पत्रों व पत्रिकाओं ने जनहित में इस आन्दोलन के विशेष आर्टिकल छापे.

कर्नाटक सरकार के वनमंत्री दौरा :

दिसम्बर 1983 के अंतिम सप्ताह में तत्कालीन कर्नाटक सरकार के वनमंत्री श्री विजया जी सिरसी (Sirsi) पधारे. सिरसी के आस पास के इलाकों में Appiko आन्दोलन शुरू हो चुका था. मंत्रीजी ने लोगों से चर्चा की तथा फोरेस्ट एरियाज में जाकर देखने का निर्णय किया. बिलगल (Bilgal) वन क्षेत्र में 400 लोगों ने मंत्री जी के साथ पदयात्रा की और एक सागवान प्लांटेशन (Teak Plantation) में गये, वहां एक बुजुर्ग आदमी ने यूपेटोरियम (एक खरपतवार) के फूलों (Blue mist) का बन्डल भेट में दिया. यह दुख की एक सांकेतिक व्यथा थी, क्योंकि कनार्टक के वन क्षेत्रों में इस खरपतवार के फैलाव ने खतरे की घण्टी बजा दी थी.

लोग वन मंत्री को सागवान प्लांटेशन मे ले गये और बताया की इसके नीचे कुछ नहीं उगता है. प्राकृतिक वन (Natural Forest) में ले जाकर दोनों में अंतर स्पष्ट किया. लोगों ने कहा कि पारिस्थितिकी संतुलन (Ecological Balance) को बनाये रखने के लिये प्राकृतिक वनों को बचाना जरूरी है. मंत्री जी ने लोगों से लम्बी चर्चा की. वन विभाग के अफसर लोगों के प्रश्नों से गड़बड़ा गये. अन्त में मंत्री जी ने प्राकृतिक वनों की Clear Felling बन्द करने का फैसला किया.

Kalase Forests में Appiko आंदोलन की साइट्स पर मंत्रीजी जहां भी गये लोगों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा, ग्रामीणों की इस स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रया से इस आंदोलन की शक्ति का स्पष्ट आभास हो गया.

मंत्री जी को दौरे के उपरान्त मानना पड़ा कि पेड़ों को काटने के प्रचलित तरीके ही वनों के नाश का कारण है. और इन तरीकों को बदलने की बात मंत्री जी ने मानी, लोगों को आश्वस्त किया इसके बाद वनों में Clear Felling नहीं की जायेगी. उन्होंने चिन्हित पेड़ों को काटने के आदेश रद्द कर दिये. उन्होंने घोषणा की कि, वनों से केवल dead, dying व diseased पेड़ों का ही कटान किया जायेगा. यह इस आन्दोलन की 4 महिने की छोटी अवधी में बहुत बड़ी सफलता थीं.

मंत्री जी के दौरे से ग्रामीणो का आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया. उन्होंने लोक शक्ति का प्रदर्शन कर दिखाया. उनकी शक्ति के कारण ही सरकार को वन मंत्री को वन बचाओ आन्दोलन की स्थिति की जानकारी लेने के लिये भेजना पड़ा. लोगों के अहिंसात्मक मार्ग से आंदोलन ने पूरे राष्ट्र का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया.

भारत सरकार का ध्यानाकर्षण :

आखिर भारत सरकार ने पश्चिमी घाटों मे वनों की कमी और पनबिजली के बांघों के कारण जलाशयों में पानी की कमी व कृषि की कमी को संज्ञान में लिया. सातवी पंचवर्षीय योजना में पश्चिमी घाटों में प्राकृतिक संसाधनों की ‘‘उच्च कमी’’ माना. पश्चिमी घाटों में शेष रहे अति संवेदनशील उष्णकटिबंधीय वनों को प्रथम प्राथमिकता पर रखा गया. अगर आगे और इन वनों का शोषण किया गया तो पेड़ों को लगाने में सदियों लग सकती है. ये अक्षय (Renewable) श्रोत नश्वर (Non Renewable) में बदल जायेंगे. एसे चरम (extreme) हालात में आने से पहले Appiko आंदोलन के उद्देश्य अनुरूप विकेन्द्रिकृत समूह बनाकर पश्चिमी घाटों में अवशेष रहे वनों को जमीन स्तर पर सीधे कार्यवाही कर बचाना है.

अप्पिको आन्दोलन (Appiko movement) का रूपरेखा :

आन्दोलन के मुख्य तीन तीन क्षेत्रों में काम कर रहा है. कन्नड़ भाषा में ये सुसु (Susu), बेलेसु (Belesu) व बालसु (Balasu) है. जिनका तात्पर्य इस प्रकार है:

  1. सुसु (Susu) – का अर्थ शेष रहे वनों को बचाना (To save).
  2. बेलेसु (Belesu) – नष्ट हुए वन क्षेत्रों को पुनर्जिवित (To grow) करना.
  3. बालसु (Balasu) – वनों का तर्क संगत उपयोग करना (Rational use).
  • सुसु (Susu) : वनों को बचाने के लिए आंदोलन के प्रति जागरूकता बढ़ाने हेतु विभिन्न तकनिकों का उपयोग किया गया. (1) वनों में बहुत अन्दर तक पैदल मार्च करना (2) स्लाइड शो (3) लोक नृत्यों द्वारा (4) नुक्कड़ नाटक व सभायें.इससे आंदोलन को अच्छी खासी सफलता मिली. राज्य सरकार ने हरे पेड़ों की कटाई पर रोक लगादी. केवल Dad, dying और diseased पेड़ों को ही काटने की अनुमति दी जिससे स्थानीय लोगों की मांग पूरी हो सके.
  • बेलेसु (Belesu) – Appiko आंदोलन के काम का दूसरा क्षेत्र वनीकरण (forestation) है. जिसके तहत जहां वन नष्ट हो चुके है, वहां वृक्षारोपण, बीजारोपण आदि कर वनीकरण करना. ग्रामीणों में हर परिवार में पौध विकास करने तथा ग्रामीण युवको के क्लब द्वारा विकेन्द्रीकृत नर्सरी तैयार करने की क्षमता विकसित की. ग्रामीणों ने वन विभाग के वनीकरण को चुनौती देते हुए Natural regeneration को बढ़ावा दिया. जिससे वन व मिट्टी दोनों का सतत विकास (Sustainable development) संभव हुआ.
  • बालसु (Balasu) – तीसरा काम वनों के तर्कसंगत उपयोग हेतु ऊर्जा के वैकल्पिक श्रोंतो को विकसित किया. जिससे वनों पर दबाव कम किया जा सके. कार्याकत्ताओं ने 2,000 Fuel effieient चूल्हे (Hearths) तैयार किये. इससे जलाऊ ईंधन की 40% बचत होती है. गलत तरीकों छंगाई की परम्पराओं को रोका. लोगों का प्रकृति के साथ सौहार्द पूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने का कार्य किया.

इस प्रकार Appiko आन्दोलन से सौहार्दपूर्ण वातावरण निर्माण होना. लोगों में पर्यावरण के प्रति जो समझ विकसित होना. इसके आलावा कर्नाटक के लोगों को पारिस्थितिकीय बदलाव की समझ होना. आदि आदि से ही  Appiko आन्दोलन स्वत:स्फूर्त होकर सतत रूप से चल रहा है.  Appiko आन्दोलन का तो नारा ही है – “Ecology is permanent economy.”

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