ग्लोबल वार्मिंग / ग्रीनहाऊस इफेक्ट: Global warming in Hindi

∗ग्लोबल वार्मिंग∗

– Global warming –

पृथ्वी के सतह के निरंतर बढ़ते तापमान की प्रक्रिया को ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं. इसे हम ग्रीनहाऊस, ग्रीनहाऊस इफेक्ट, ग्रीनहाऊस गैसों के प्रभाव और प्रक्रिया के साथ आसानी से समझ सकते हैं.

ग्रीनहाऊस (Greenhouse) :

greenhouse

एक इमारत की संरचना (structure) जो पारदर्शी पदार्थों (materials) कांच, प्लास्टिक आदि से बनी होती है. जिसके अन्दर एक Regulated climatic condition की जरूरत वाले पौधां को तैयार किया जाता है तथा वो बढ़त हासिल (Grow) करते है, को ग्रीनहाऊस कहते हैं. उपयोग के अनुसार ग्रीनहाऊस अलग-अलग साइज के बनाये जाते हैं. व्यावसायिक ग्रीन हाऊस काफी बड़े बनाये जाते हैं. व्यावसायिक ग्रीनहाऊस में काफी उच्च तकनिकी का उपयोग किया जाता है. कम्प्यूटर की सहायता से पौधों की Growth के लिये Temperature को optimize कर दिया जाता है. ग्रीनहाऊस में अंदर का भाग सूर्य की किरणों को सीधा फेस करता है. ग्रीनहाऊस में सूर्य के प्रकाश के साथ ultraviolet तथा Infrared विकिरण भी कांच आदि पारदर्शी पदार्थों (materials) से पार होकर Greenhouse के अन्दर चले जाते हैं. ग्रीनहाऊस के अन्दर पृथ्वी तथा अन्दर के पौधों आदि के द्वारा सभी वेवलेन्थ की ऊर्जा को अवशोषित कर लिया जाता है. मगर इनके द्वारा वापस उत्सर्जित की गयी ऊष्मा (ऊर्जा) Infrared के स्पेक्ट्रम की वेवलेन्थ की होती है. जो कांच आदि के माध्यम से न विकिरण और न ही संवहन (covection) द्वारा ग्रीन हाऊस बाहर निकल पाती है. इसे ही ग्रीन हाऊस इफेक्ट कहते हैं. इससे ग्रीन हाऊस के अन्दर का तापमान उसके आस-पास के तापमान से काफी अधिक रहता है.

ग्रीनहाऊस इफेक्ट :

greenhouse effect

पृथ्वी के सौरमण्डल में कुछ ग्रह बहुत ज्यादा गर्म या कुछ बहुत ज्यादा ठण्डे हैं. जबकि पृथ्वी का तापमान जीवन के लिये बहुत माफिक है क्योंकि पृथ्वी के चारों तरफ गैसों से बना उचित वातावरण है. जो पृथ्वी का आवरण कर सुरक्षा करता है. कम से कम 97% (लगभग सभी) वैज्ञानिक यह मानते है कि पिछले 200 वर्षों इन्सान की गतिविधियों ने पृथ्वी के वातावरण को बदल दिया है, जिसके परिणाम स्वरूप आज ग्लोबल वार्मिग का खतरा पैदा हो गया है. ग्लोबल वार्मिंग को समझने के लिये पहले हमें ऊर्जा के आदान-प्रदान की प्रक्रिया से ग्रीनहाऊस इफेक्ट को अच्छी तरह समझना होगा.

ऊर्जा का आदान-प्रदान :

प्रतिदिन पूरी पृथ्वी पर अंतरिक्ष से विकिरण आने और प्रावर्तित होकर जाने के बीच बहुत ही नाजुक सन्तुलन रहता है. पृथ्वी पर बहुत भारी मात्रा में सूर्य के विकिरणों की बौछार होती है. प्रकाश + अल्ट्रावॉइलेट व इनफ्रारेड तथा अन्य आंखों से नहीं दिखने वाले अदृष्य विकिरण के रूप में, सौर विकिरण पहले पृथ्वी के वायु मण्डल से टकराते है. अल्ट्रावोइलेट विकिरण प्रकाश से कम वेवलेन्थ व उच्च ऊर्जा स्तर के विकिरण (radiation) होते हैं. NASA के अनुसार 30% विकिरण बादलों धूल के कणों, बर्फ, स्नो तथा अन्य की सतह से टकराकर पुनः अंतरिक्ष में प्रावर्तित हो जाते है. बाकी बचे 70% विकिरण पृथ्वी के भूतल, महासागर और वायुमण्डल द्वारा अवशोषित कर लिये जाते हैं. जैसे ही ये गर्म होते है ये इफ्रारेड विविकरण के रूप में ऊष्मा विकिरण छोड़ना शुरू कर देते है जो वायुमण्डल को पार करके अंतरिक्ष में चल जाते हैं. इस प्रकार विकिरण के आदान-प्रदान का एक साम्य बना रहता है. जिससे पृथ्वी पर वातावरण जीव-जन्तु के निवास करने लायक हो जाती है, तथा पृथ्वी का औसतन तापमान 15°C अर्थात 59°F बना रहता है. इस सन्तुलन के बिना पृथ्वी चांद (-153°C) की तरह ठण्डी या विनस (462°C) की तरह गरम रहती. इस विकिरण के आगम और निर्गम से ऊर्जा के आदान-प्रदान से पृथ्वी का वातावरण गर्म रहता है. इसको ग्रीनहाऊस इफेक्ट कहते है क्योंकि लगभग ग्रीन हाऊस की तरह ही कार्य करता है. संतुलित ग्रीनहाउस इफेक्ट से ही पृथ्वी पर वातावरण जीव-जन्तु के निवास करने लायक गर्म वातावरण रहता है. ग्रीनहाऊस से अल्ट्रावॉयलेट विकिरण काँच को आसानी से पार कर जाते है जबकि पौधे, जमीन व अन्य ठोस सतहों द्वारा छोडे गये इन्फ्रारेड विकिरण कांच को पार नहीं कर पाते हैं. और ग्रीन हाऊस अंदर ही रह जाते हैं जिससे ग्रीन हाऊस बाहर के वातावरण से अधिक गर्म रहता है. (ग्रीन हाऊस ईफेक्ट के कारण ही कार अन्दर से गर्म रहती है.)

ग्रीन हाऊस गैसें तथा ग्लोबल वार्मिंग :

जिन गैसों के अणुओं द्वारा भारी मात्रा में ऊष्मीय इन्फ्रारेड विकिरण को शोषित करने की क्षमता होती है, वो मौसम तन्त्र को बदल सकती है. इस तरह के गैस अणुओं को ग्रीनहाऊस गैसें कहते हैं. ये गैसें कम्बल की तरह कार्य करती है. ये इन्फ्रारेड विकिरण को अवशोषित करती हैं और उनको बाहरी अन्तरिक्ष में जाने से रोकती हैं.

Greenhouse gases

इन्वारवमेंट प्रोटेक्शन ऐजेन्सी (EPA) के अनुसार ग्रीन हाऊस गैसों मे कार्बनडाई आक्साई, वाटर वेपर, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन, कलोरोफ्लोरो कार्बनस् आदि शामिल हैं. ग्रीनहाऊस गैसों की बढ़ोतरी के प्रभाव से पृथ्वी की सतह तथा वायुमण्डल का तापमान धीरे-धीरे बढ रहा है, जिसे ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं. सन् 1800 ई. के आस-पास जो औधोगिक क्रान्ति आयी उसमें कोयले, ऑयल, गैसोलीन आदि ईंधन के उपयोग से वातावरण में विशेषकर कार्बनडाइ आक्साइड भारी मात्रा में बढी है. कार्बनडाइ आक्साइड बढ़ने दूसरा सबसे कारण वनों की कटाई है, जिससे 6 से 17% के बीच कार्बनडाइ आक्साइड बढी है. ग्रीनहाऊस इफेक्ट और ग्रीनहाऊस गैसेज के संयुक्त प्रभाव से बढ़ती ग्लोबल वर्मिंग के कारण भविष्य मे बहुत भयानक परिणाम हो सकते हैं.

Globle warming

Related Posts :

चिपको आन्दोलन 1730

चिपको आन्दोलन 1974

चिपको आन्दोलन 1983

पृथ्वी दिवस

वन महोत्सव

ओजोन दिवस

वन्य प्राणी सप्ताह

=============

निवेदन : 1. कृपया अपने Comments से बताएं आपको यह Post कैसी लगी.

  1. यदि आपके पास Hindi में कोई Inspirational Story, Important Article या अन्य जानकारी हो तो आप हमारे साथ शेयर कर सकते हैं. कृपया अपनी फोटो के साथ हमारी e mail ID : sahisamay.mahesh@gmail.com पर भेजें. आपका Article चयनित होने पर आपकी फोटो के साथ यहाँ प्रकाशित किया जायेगा.

=============

One Comment

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *