महाकवि घाघ की कहावतें| Ghagh ki Kahavten

∗महाकवि घाघ∗

– Ghagh ki Kahavten –

Ghagh Bhaddari 3

“कांटा बुरा करील का, औ बदरी का घाम।

सौत बुरी है चून को, और साझे का काम॥”

— महाकवि घाघ —

व्यावहारिक ज्ञान को विशेषरूप से कृषि व मौसम के बारे में घाघ भड्डरी ने लोकभाषा में सरल कहावतों के रूप में बताया है. उनकी जितनी कहावतें हैं, सभी प्रायः अक्षरशः सत्य उतरती हैं. देहात में तो इनकी कहावतें (Ghagh ki Kahavten) किसानों को कंठस्थ हैं. किसान आज भी इन कहावतों पर पूरा भरोसा रखते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी कहावतों से मौसम के रुझान का अदाज कर किसान अपनी फसलों की तैयारी करते हैं.

घाघ भड्डरी के जीवनकाल के बारे में स्पष्ट रूप कुछ नहीं कहा जा सकता है. घाघ भड्डरी एक ही थे या दो, इस विषय में मतभेद हैं. दोनों की कहावतें एक ही शैली की हैं. कहावतों में कई बार आया है कि ‘कहै घाघ सुनु भड्डरी’ ‘कहै घाघ सुन घाघिनी’ आदि. इससे लगता है कि घाघ और भड्डरी ये दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हैं या भड्डरी या घाघिनी घाघ की पत्नि है. घाघ अत्यंत कुशल, बुद्धिमान, नीतिमान तथा भविष्य का ज्ञान रखने वाले थे. इसलिए सामान्यतया कोई व्यक्ति अत्यंत नीतिनिपुण, चालाक एवं गहरी सूझबूझ और पैठ रखने वाला हो तो उसे कह दिया जाता है कि, अरे! वह तो बड़ा ही घाघ है.

कहा जाता है कि घाघ का पूरा नाम देवकली दुबे था. इनके दो पुत्र थे और ये कन्नौज के चौधरीसराय के निवासी थे. घाघ की प्रतिभा से सम्राट अकबर भी बहुत प्रभावित थे, फलस्वरूप उपहार में उन्होंने इन्हें ‘चौधरी’ की उपाधि, प्रचुर धनराशि तथा कन्नौज के पास भूमि दी. इन्होंने जो गांव बसाया, उसका नाम ‘अकबराबाद सराय घाघ’ पड़ा. अकबर की मृत्यु सन् 1605 ईस्वीं में हो गई थी. अत: घाघ का जन्म-समय 16वीं सदी के मध्यकाल के पहले का रहा होगा.

घाघ भड्डरी की कहावतें

घाघ बचपन से ही कृषि विषयक समस्याओं के निदान में अत्यंत दक्ष थे. दूर-दूर से लोग इनके पास समाधान के लिए आया करते थे. एक बार घाघ बचपन में हमउम्र बच्चों के साथ खेल रहे थे, उसी समय एक ऐसा व्यक्ति इनके समीप आया जिसके पास कृषि कार्य के‍ लिए बहुत भूमि थी, किंतु उपज उसमें इतनी कम होती थी कि, उसको परिवार के भोजन के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था. उस व्यक्ति की समस्या सुनकर घाघ तुरंत बोले –

आधा खेत बटैया देके, ऊँची दीह किआरी।

जो तोर लइका भूखे मरिहें, घघवे दीह गारी॥

अर्थ : यदि किसान के पास खेत अधिक है तो आधा बटाई पर दे देना चाहिए और आधे खेत में ऊँची मेड़ बाँधकर खेती करनी चाहिए. यदि इतना करने पर भी पैदावार अच्छी न हो तो मुझे गाली देना. कहा जाता है कि घाघ के कथनानुसार करने पर वह किसान धन-धान्य से पूर्ण हो गया.

देवनारायण द्विवेदी की पुस्तक घाघ भड्डरी की कहावतों से स्पष्ट हो जाता है कि घाघ को व्यावहारिक ज्ञान के साथ ग्रह-नक्षत्रों, कृषि विज्ञान व ज्योतिष का गहरा ज्ञान था. उनके द्वारा प्रस्तुत महाकवि घाघ की कुछ कहावतें व उनका अर्थ :

कांटा बुरा करील का, औ बदरी का घाम।

सौत बुरी है चून को, और साझे का काम॥

अर्थ : करील का कांटा, बदली की धूप, सौत आटे की भी, और साझे का काम बुरा होता है.

दुश्मन की किरपा बुरी, भली मित्र की त्रास।

आडंगर गरमी करैं, जल बरसन की आस॥

अर्थ : शत्रु की दया की अपेक्षा मित्र की फटकार अच्छी है, जैसे गर्मी की अधिकता से कष्ट मिलता है, परन्तु जल बरसने की आशा होने लगती है.

खेती पाती बीनती, और घोड़े की तंग।

अपने हाथ संभारिये, लाख लोग हों संग॥

अर्थ : खेती, प्रार्थना पत्र, तथा घोड़े के तंग को अपने हाथ से ठीक करना चाहिए किसी दूसरे पर विश्वास नहीं करना चाहिए.

औझा कमिया, वैद किसान।

आडू बैल और खेत मसान॥

अर्थ : नौकरी करने वाला औझा, खेती का काम करने वाला वैद्य, बिना बधिया किया हुआ बैल और मरघट के पास का खेत हानिकारक है.

शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।

तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए॥

अर्थ : शुक्रवार के बादल शनिवार को छाए रहें, तो भड्डरी कहते हैं कि वे बादल बिना बरसे नहीं जायेंगे.

सावन मास बहे पुरवइया।

बछवा बेच लेहु धेनु गइया॥

अर्थ : यदि सावन महीने में पुरवैया हवा बह रही हो तो अकाल पड़ने की संभावना है. किसानों को चाहिए कि वे अपने बैल बेच कर गाय खरीद लें.

रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय।

कहै घाघ सुन घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय॥

अर्थ : यदि रोहिणी पूरा बरसे, मृगशीर्ष में तपन रहे और आद्रा में साधारण वर्षा हो जाए तो धान की पैदावार इतनी अच्छी होगी कि कुत्ते भी भात नहीं खाएंगे.

सर्व तपै जो रोहिनी, सर्व तपै जो मूर।

परिवा तपै जो जेठ की, उपजै सातो तूर॥

अर्थ : रोहिणी भरपूर तपे और मूल भी पूरा तपे तथा जेठ की प्रतिपदा तपे तो सातों प्रकार के अन्न पैदा होंगे.

उत्रा उत्तर दै गयी, हस्त गयो मुख मोरि।

भली विचारी चित्तरा, परजा लेइ बहोरि॥

अर्थ : उत्तरा और हथिया नक्षत्र में यदि पानी न भी बरसे और चित्रा में पानी बरस जाए तो उपज ठीक ठाक होगी.

पुरुवा रोपे पूर किसान।

आधा खखड़ी आधा धान॥

अर्थ : पूर्वा नक्षत्र में धान रोपने पर आधा धान और आधा खखड़ी पैदा होता है.

आद्रा में जौ बोवै साठी।

दु:खै मारि निकारै लाठी॥

अर्थ : जो किसान आद्रा नक्षत्र में धान बोता है वह दु:ख को लाठी मारकर भगा देता है.

गहिर न जोतै बोवै धान।

सो घर कोठिला भरै किसान॥

अर्थ : गहरा न जोतकर धान बोने से उसकी पैदावार खूब होती है.

अखै तीज तिथि के दिना, गुरु होवे संजूत।

तो भाखैं यों भड्डरी, उपजै नाज बहूत॥

 अर्थ : यदि वैशाख में अक्षय तृतीया को गुरुवार पड़े तो खूब अन्न पैदा होगा.

नारि सुहागिन जल घट लावै, दधि मछली जो सनमुख आवै।

सनमुख धेनु पिआवै बाछा, यही सगुन हैं सबसे आछा॥

अर्थ : यदि सौभाग्यवती स्त्री पानी से भरा घड़ा ला रही हो, कोई सामने से दही और मछली ला रहा हो या गाय बछड़े तो दूध पिला रही हो तो यह सबसे अच्छा शगुन होता है.

Ghagh Bhaddari 2

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