छठ पूजा | Chhath Pooja

∗ छठ पूजा ∗

– Chhath Pooja –

छठ पूजा 3

छठ पूजा – एक परिचय

छठ पूजा (Chhath Pooja) विशेषरूप से आरोग्यता, स्वच्छता व मनोकामना पूर्ती का पर्व है. Chhath Pooja का पर्व दीपावली के छ: दिन बाद यानि कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक सूर्योपासना का पर्व है. मुख्य रूप से यह पर्व पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है.

छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है. इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है. इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं. व्रतधारी पानी भी ग्रहण नहीं करते.

छठ पूजा – विधि

पहिले दिन – नहाय खाय

पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है. सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र बना लिया जाता है. इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं. भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है.

दूसरे दिन – लोहंडा या खरना

दूसरे दिन कार्तीक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं. इसे ‘लोहंडा या खरना’ कहा जाता है. खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है. प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है. इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है. इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है.

तीसरे दिन – संध्या अर्घ्य

तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है. प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं. इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है.

शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं. सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं. सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है. तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है. इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है.

चौथे दिन – उषा अर्घ्य

चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. व्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था. पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है. अंत में व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं.

छठ पूजा – ज्योतिष व विज्ञान के अनुसार

छठ पर्व की परंपरा में बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है, षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगौलीय अवसर है. उस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें (ultra violet rays) पृथ्वी की सतहपर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं. उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथा संभव रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में है. पर्व पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा संभव है. पृथ्वी के जीवों को इससे बहुत लाभ मिलता है. सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैगनी किरण भी चंद्रमा और पृथ्वी पर आती हैं. सूर्यका प्रकाश जब पृथ्वी पर पहुंचता है, तो पहले उसे वायुमंडल मिलता है. वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसे आयन मंडल मिलता है. पराबैगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है. इस क्रिया द्वारा सूर्य की पराबैगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल के आयन मंडल में ही अवशोषित हो जाता है. पृथ्वी की सतह पर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुंच पाता है. सामान्य अवस्था में पृथ्वी की सतह पर पहुंचने वाली पराबैगनी किरणों की मात्रा मनुष्यों या जीवों के सहन करने की सीमा में होती है. अत: सामान्य अवस्था में मनुष्यों पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि उस धूपद्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवन को लाभ ही होता है. छठ जैसी खगौलीय स्थिति (चंद्रमा और पृथ्वी के भ्रमण तलों की सम रेखा के दोनों छोरों पर) सूर्य की पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्वी पर पुन: सामान्य से अधिक मात्रा में पहुंच जाती हैं. वायुमंडल के स्तरों से आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छ: दिन उपरांत आती है. ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इस पर्व का नाम छठ पर्व रखा गया है. छठ पूजा से इन हानिकारक किरणों का प्रभाव कम हो जाता है.

छठ पूजा – पौराणिक और लोक कथाएँ

लोक परंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मैया का भाई-बहन संबंध का है. लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी.

एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की. सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशिर्वाद प्राप्त किया.

एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई. सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की. कर्ण सूर्य भगवान के परम भक्त थे. वे प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे. सूर्य की कृपा से ही वे महान योद्धा बने. आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति है. दूसरी जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा. तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया.

पुराणों की कथा के अनुसार राजा प्रियवंद के कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी. इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ. प्रियवंद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे. उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि ‘सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ. राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो.’ राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी.

छठ पूजा की बहुत-बहुत शुभ कामनाएँ! धन्यवाद.

छठ पूजा

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