अफज़ल खाँ और शिवाजी Courageous Story

∗अफज़ल खाँ और शिवाजी∗

Shivaji Versus Afzal khan

शिवाजी shivaji 1

Shivaji Versus Afzal khan – 1 नवम्बर 1656 को बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह की मृत्यु हो गई. इससे बीजापुर में अराजकता का माहौल पैदा हो गया. इस स्थिति का लाभ उठाकर औरंगज़ेब ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया और शिवाजी ने औरंगजेब का साथ देने की बजाय उस पर धावा बोल दिया. फलस्वरूप औरंगजेब शिवाजी से खफ़ा हो गये. और शाहजहाँ के आदेश पर औरंगजेब ने बीजापुर के साथ संधि कर ली. इस दौरान शाहजहाँ बीमार पड़ गये. इसलिये औरंगज़ेब वापस उत्तर भारत चले गये.

औरंगजेब के आगरा लौटने के बाद बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह द्वितीय ने भी राहत की सांस ली. अब शिवाजी ही बीजापुर के सबसे प्रबल शत्रु रह गये थे. सुल्तान ने शाहजी को अपने पुत्र को नियंत्रण में रखने को कहा था. पर शाहजी ने इसमें अपनी असमर्थता जाहिर कर दी थी. शिवाजी को समाप्त के लिए बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह की विधवा बेगम ने अफ़ज़ल खाँ (अब्दुल्लाह भटारी) को शिवाजी के विरूद्ध (Shivaji Versus Afzal khan) भेजा.

अफ़जल खाँ ने बारूद असले व घुड़सवारों से सुसजित विशाल सेना के साथ 1659 में कूच किया. अफ़जल रास्ते में लूटपाट करता हुआ प्रतापगढ़ पहुंचे. शिवा जी का खून खौल उठा पर वो जानते थे कि, उनकी सैन्य क्षमता सीमित है. अतः उन्होंने कूटनीति का परिचय दिया और मौन साधे रखा. अफ़जल खाँ ही उनके पिता को बंदी बनाने तथा भाई संभाजी की मौत का सूत्रधार था. अफ़जल खाँ ने शिवाजी के पास सन्धि-वार्ता के लिए अपने दूत कृष्णजी भास्कर के साथ मैत्री का सन्देश भेजा. उसने उसके मार्फत ये संदेश भिजवाया कि, अगर शिवाजी बीजापुर की अधीनता स्वीकार कर ले, तो सुल्तान उसे उन सभी क्षेत्रों का अधिकार दे देंगे जो शिवाजी के नियंत्रण में थे. साथ ही शिवाजी को बीजापुर के दरबार में एक सम्मानित पद प्राप्त होगा.

शिवाजी के मंत्री व सलाहकार इस संधि के पक्ष में थे. पर शिवाजी को ये बात रास नहीं आ रही थी. उन्होंने कृष्णजी भास्कर को उचित सम्मान देकर अपने दरबार में रख लिया और अपने दूत गोपीनाथ को वस्तुस्थिति का जायजा लेने अफजल खाँ के पास भेजा. गोपीनाथ और कृष्णजी भास्कर से शिवाजी को लगा कि सन्धि का षडयंत्र रचकर अफजल खाँ शिवाजी को बन्दी बनाना चाहता है.

शिवाजी ने भी कूटनीति का उत्तर कूटनीति से देते हुए अफजल खाँ को एक बहुमूल्य उपहार भेजे. और इस तरह अफजल खाँ से सन्धि वार्ता के लिए तैयार हो गये.

10 नवमबर 1659 को अफ़जल खाँ अपनी सेना के साथ वार्ता स्थल पर पहुँच गये. शिवाजी से प्रेम करने वाले उनके देशभक्त साथी अन्य सेनापति आदि शिवाजी की सुरक्षा को लेकर बहुत चिंतित थे. परन्तु शिवाजी के ह्रदय में तो स्वराज्य को सुदृढ़ करने का निश्चय था. शिवाजी ने अपना जिरह बख्तर, कुर्त्ता और अंगरखा धारण किये. तथा सर पर बख्तर धारण कर टोपी पहनी, अपने एक हाथ में बघनखा धारण किया और अफ़जल खाँ से मिलने चल दिये.

धूर्त अफ़जल खाँ ने शिवाजी को गले मिलने का न्यौता दिया. लम्बे भीमकाय शारीर वाले अफ़जल खाँ ने कंधे तक पहुँचने वाले शिवाजी की गर्दन अपनी बगल में दबाकर पेट में कटार मारने वाला ही थे कि, पलभर में शिवाजी ने बांये हाथ में छुपाए बाघनख से खान का पेट फाड़ दिया और मार दिया. अफजल खाँ की मौत का इशारा मिलते ही तैयार खड़ी मावली सेना ने मोरोपन्त पिंगले और नेताजी पालकर के नेतृत्व में खान की फौज पर आक्रमण कर दिया. और बौखलायी हुई सेना को खुले युद्ध में परास्त किया. और जो सामान अफ़जल खाँ ने प्रतापगढ़ आते हुए लूटा था, वो अपने कब्जे में कर लिया.

शिवाजी महाराज ने अदम्य साहस, अचूक योजना, अनूठी सूझ-बूझ से एक कपटी वीर सरदार और उसकी फ़ौज का अंत कर दिया.

शिवाजी shivaji afzal

 जरुर पढ़ें : शिवाजी की जीवनी

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