∗जहाँ चाह, वहाँ राह∗

Siddharth Buddha in hindi

होनहार बिरवान के होत चीकने पात. केवल इतने से ही सब कुछ नहीं हो जाता है. अगर व्यक्ति अपनी अभिरुचि के अनुसार प्रयास करता है, तो परस्थितियाँ कहें या भगवान कहें उसका साथ जरुर देते हैं. गौतमबुद्ध के सिद्धार्थ से बुद्ध बनने के सफर की कहानी कुछ ऐसी ही है. उनके नामकरण संस्कार में 8 ऋषियो को आमन्त्रित किया गया था, सभी ने दो सम्भावनायें व्यक्त की, पहली महान राजा बनने की तथा दूसरी महान योगी बनने की. इस भविष्य वाणी को सुनकर राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ को साधु बनने से रोकने की बहुत कोशिशें की. परन्तु जहाँ चाह हो वहाँ राह बनती चली जाती है.

गौतम बुद्ध के शुरुवाती अहिंसावादी लक्षण :

गौतम बुद्ध के मन में प्राणी मात्र के दया के भाव बचपन से थे. उनके आरंभिक जीवन की अनेक घटनाओं से इसका पता चलता है. घुड़दौड़ में जब घोड़े दौड़ते और उनके मुँह से झाग निकलने लगता तो सिद्धार्थ उन्हें थका जानकर वहीं रोक देते और जीती हुई बाजी हार जाते. खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था, क्योंकि किसी को हराना और किसी को दुःखी होता उनसे नहीं देखा जाता था. ऐसे ही सिद्धार्थ ने चचेरे भाई देवदत्त द्वारा तीर से जब हंस को घायल किया तब उनहोंने उसकी सहायता कर उसके प्राण बचाये.

युवावस्था में गौतम बुद्ध पर चार दृश्यों का प्रभाव :

उम्र के साथ-साथ उनके विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया. उनके पिता की कोशिशें भी इसमें कामयाब नहीं हुई. उनके जीवन में आये चार दृश्यों ने, उनके जीवन की दिशा तय की. ये चारों दृश्य उनके अकेले या सारथी या मित्र छन्दक के साथ बाहर सैर करते समय दिखाई दिये.

युवास्था में सिद्धार्थ के पिता राजा शुद्धोधन ने उनके आराम के लिये सुविधा से भरपूर तीन ऋतुओं के अनुकूल तीन सुंदर महल बनवा दिए थे. मनोरंजन के सारे साधन जुटा दिये थे. दास-दासी उनकी सेवा में लगा दिये थे. पर ये सब चीजें सिद्धार्थ को बदल न सकी. वसंत ऋतु में एक दिन सिद्धार्थ बगीचे की सैर पर निकले. तब उनके सामने ये चार दृश्य आये :

1.         उन्हें सड़क पर एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया. उसके दाँत टूट गए थे, बाल पक गए थे, शरीर टेढ़ा हो गया था. हाथ में लाठी पकड़े धीरे-धीरे काँपता हुआ वह सड़क पर चल रहा था.

2.         दूसरी बार कुमार जब बगीचे की सैर को निकले, तो उसकी आँखों के आगे एक रोगी आ गया. उसकी साँस तेजी से चल रही थी. कंधे ढीले पड़ गए थे. बाँहें सूख गई थी. पेट फूल गया था. चेहरा पीला पड़ गया था. दूसरे के सहारे वह बड़ी मुश्किल से चल पा रहा था.

3.         तीसरी बार सिद्धार्थ को एक अर्थी मिली. चार आदमी उसे उठाकर लिए जा रहे थे. पीछे-पीछे बहुत से लोग थे. कोई रो रहा था, कोई छाती पीट रहा था, कोई अपने बाल नोच रहा था.

4.         चौथी बार कुमार बगीचे की सैर को निकला, तो उन्हें एक संन्यासी दिखाई पड़ा. संसार की सारी भावनाओं और कामनाओं से मुक्त प्रसन्नचित्त सन्यासी ने सिद्धार्थ को आकृष्ट किया.

इन दृश्यों ने सिद्धार्थ को बहुत विचलित किया. उन्होंने सोचा कि ‘धिक्कार है जवानी को, जो जीवन को सोख लेती है. धिक्कार है स्वास्थ्य को, जो शरीर को नष्ट कर देता है. धिक्कार है जीवन को, जो इतनी जल्दी अपना अध्याय पूरा कर देता है. क्या बुढ़ापा, बीमारी और मौत सदा इसी तरह होती रहेगी भगवन?

जहाँ चाह वहाँ राह :

शाक्यों का अपना एक संघ था. बीस वर्ष की आयु होने पर हर शाक्य तरुण को शाक्यसंघ में दीक्षित होकर संघ का सदस्य बनना होता था. सिद्धार्थ गौतम जब बीस वर्ष के हुये तो उन्होंने भी शाक्यसंघ की सदस्यता ग्रहण की. वे संघ के अत्यन्त समर्पित और पक्के सदस्य थे. संघ के मामलों में वे बहुत रूचि रखते थे. संघ के सदस्य के रुप में उनका आचरण एक उदाहरण था. उन्होंने स्वयं को सबका प्रिय बना लिया था. शाक्यसंघ के नियमानुसार सिद्धार्थ को शाक्यसंघ का सदस्य बने हुये आठ वर्ष व्यतीत हो चुके थे. आठवें वर्ष में एक ऐसी घटना घटी जो शुद्धोदन के परिवार के लिये दुखद बन गयी. सिद्धार्थ के जीवन में संकटपूर्ण स्थिति पैदा हो गयी. शाक्यों के राज्य की सीमा से सटा हुआ कोलियों का राज्य था. रोहणी नदी दोनों राज्यों की विभाजक रेखा थी. शाक्य और कोलियों दोनों ही रोहिणी नदी के पानी से अपने-अपने खेत सींचते थे. हर फसल पर उनका आपस में विवाद होता था कि कौन रोहिणी के जल का पहले और कितना उपयोग करेगा. ये विवाद कभी-कभी झगड़े और लड़ाइयों में बदल जाते थे.

जब सिद्धार्थ 28 वर्ष के थे, रोहणी के पानी को लेकर शाक्य और कोलियों के नौकरों में झगड़ा हुआ, जिसमें दोनों ओर के लोग घायल हुये. झगड़े का पता चलने पर शाक्यों और कोलियों ने सोचा कि क्यों न इस विवाद को युद्ध द्वारा हमेशा के लिये हल कर लिया जाये. शाक्यों के सेनापति ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा के प्रश्न पर विचार करने के लिये शाक्यसंघ का एक अधिवेशन बुलाया और संघ के समक्ष युद्ध का प्रस्ताव रखा. सिद्धार्थ गौतम ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और कहा युद्ध किसी प्रश्न का समाधान नहीं होता, युद्ध से किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी, इससे एक दूसरे युद्ध का बीजारोपण होगा. सिद्धार्थ ने कहा मेरा प्रस्ताव है कि हम अपने में से दो आदमी चुनें और कोलियों से भी दो आदमी चुनने को कहें. फिर ये चारों मिलकर एक पांचवा आदमी चुनें. ये पांचों आदमी मिलकर झगड़े का समाधान करें. सिद्धार्थ का प्रस्ताव बहुमत से अमान्य हो गया. शाक्य सेनापति के युद्ध का प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित हो गया.

शाक्यसंघ और शाक्य सेनापति से विवाद न सुलझने पर अन्ततः सिद्धार्थ के पास तीन विकल्प आये. तीन विकल्पों में से उन्हें एक विकल्प चुनना था (1) सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेना, (2) अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिए राजी होना, (3) फाँसी पर लटकना या देश निकाला स्वीकार करना. उन्होंने तीसरा विकल्प चुना और परिव्राजक बनकर देश छोड़ने के लिए राज़ी हो गए. यही उनकी चाह थी. और इस घटना से उनको राह मिल गयी.

महाभिनिष्क्रमण :

सुंदर पत्नी यशोधरा, दुधमुँहे राहुल और कपिलवस्तु जैसे राज्य का मोह छोड़कर सिद्धार्थ तपस्या के लिए चल पड़े. परिव्राजक बनकर सर्वप्रथम सिद्धार्थ ने पाँच ब्राह्मणों के साथ अपने प्रश्नों के उत्तर ढूंढने शुरू किये. वे उचित ध्यान हासिल कर पाए, परंतु उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले. फ़िर उन्होने तपस्या करने की कोशिश की. वे इस कार्य में भी अपने गुरुओं से भी ज़्यादा निपुण निकले, परंतु उन्हे अपने प्रश्नों के उत्तर फ़िर भी नहीं मिले. इसके बाद उन्होंने कुछ साथी इकठ्ठे किये और अधिक कठोर तपस्या करने चल दिये. ऐसे करते करते छः वर्ष बाद, बिना अपने प्रश्नों के उत्तर पाएं, भूख के कारण मृत्यु के करीब से गुजरे.

शांति हेतु बुद्ध का मध्यम मार्ग :

एक दिन कुछ स्त्रियाँ किसी नगर से लौटती हुई पास से निकलीं, जहाँ सिद्धार्थ तपस्या कर रहे थे. उनका एक गीत सिद्धार्थ के कान में पड़ा – “वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ दो. ढीला छोड़ देने से उनका सुरीला स्वर नहीं निकलेगा. पर तारों को इतना कसो भी मत कि वे टूट जायें.” बात सिद्धार्थ को जच गई. वह मान गया कि नियमित आहार-विहार से ही योग सिद्ध होता है. अति किसी बात की अच्छी नहीं. किसी भी प्राप्ति के लिए मध्यम मार्ग ही ठीक होता है.

ज्ञान प्राप्ति : सिद्धार्थ से बुद्ध :

वैशाखी पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ वटवृक्ष के नीचे ध्यानस्थ थे. समीपवर्ती गाँव की एक स्त्री सुजाता को पुत्र हुआ. उसने बेटे के लिए एक वटवृक्ष से मनौती की थी. वह मनौती पूरी होने पर सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर पहुँची. सिद्धार्थ वहाँ बैठे ध्यान कर रहे थे. उन्हें लगा कि वृक्षदेवता ही मानो पूजा लेने के लिए शरीर धरकर बैठे हैं. सुजाता ने बड़े आदर से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा – “जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो.” उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई. उन्हें सच्चा बोध हुआ. तभी से सिद्धार्थ गौतम बुद्ध कहलाए. जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध मिला वह बोधिवृक्ष कहलाया और गया का समीपवर्ती वह स्थान बोधगया.

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चार सप्ताह तक बोधिवृक्ष के नीचे रहकर धर्म के स्वरूप का चिंतन करने के बाद बुद्ध धर्म का उपदेश करने निकल पड़े. आषाढ़ की पूर्णिमा को वे काशी के पास मृगदाव (वर्तमान में सारनाथ) पहुँचे. वहीं पर उन्होंने सबसे पहला धर्मोपदेश दिया और पहले के पाँच मित्रों को अपना अनुयायी बनाया और फिर उन्हें धर्म प्रचार करने के लिये भेज दिया.

और उन्होंने जीवन पर्यंत 80 वर्ष की उम्र तक अपने धर्म का संस्कृत के बजाय उस समय की सीधी सरल लोकभाषा पाली में प्रचार किया. उनके सीधे सरल धर्म की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी. और आज भी गौतमबुद्ध हमारी प्रेरणा के श्रोत हैं.

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