बूमरैंग से बचें : व्यक्तित्व विकास का अचूक फ़ॉर्मूला

∗बूमरैंग से बचें∗

(Buddha Personality Development Mantra)

 Boomerang

.बूमरैंग. सौजन्य – Google Imaze.

Buddha Personality Development Mantra को जानने से पहले बूमरैंग को समझें. बूमरैंग आस्ट्रेलिया के आदिवासियों द्वारा प्रयुक्त एक मुड़ा हुआ बाण जो फेंकने वाले के पास लौट आता. अच्छी न लगने वाली बात या अव्यवहारिक बात या बुरी बात के जवाब में की गयी प्रतिक्रिया (Reaction) बूमरैंग (BOOMERANG) की तरह है. ऐसी प्रतिक्रिया से कोई सकारात्मक परिणाम नहीं आता है. इसके उलट सामने वाला बचाव में सौ गुना ज्यादा उत्तेजना से अपनी गलत बात को भी सही ठहराने की कोशिश करेगा. परिणाम नकारात्मक, सम्बन्ध ख़राब, माहौल खराब, समय की बर्बादी आदि आदि.

ऐसी प्रतिक्रिया को हम आलोचना कह सकते हैं. जो आलोचना करेगा यह उसीके पास कई गुना अधिक के साथ वापस आती है. इससे हमारा ही नुकसान ज्यादा होगा. इसी तथ्य को साबित करती गौतम बुद्ध की ये कहानी है :

एक बार गौतम बुद्ध किसी गाँव से गुजर रहे थे. उस गाँव के लोगों को गौतम बुद्ध के बारे में गलत धारणा थी. इसी कारण वे बुद्ध को अपना दुश्मन मानते थे. जब गौतम बुद्ध गाँव में आये तो गाँव वालों ने बुद्ध को भला बुरा कहा, गालियाँ दी, बद्दुआयें दी.

गौतम बुद्ध गाँव वालों की बातें शांति से सुनते रहे और जब गाँव वाले बोलते बोलते थक गए तो बुद्ध ने कहा – “अगर आप सभी की बातें समाप्त हो गयी हो तो मैं प्रस्थान करूँ.

बुद्ध की बात सुनकर गाँव वालों को आश्चर्य हुआ. उनमें से एक व्यक्ति ने कहा “हमने तुम्हारी तारीफ नहीं की है. हम तुम्हे गालियाँ और बद्दुआयें दे रहे हैं. क्या तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ता?”

बुद्ध ने कहा “मैं आपकी गालियाँ नहीं लेता. आपके द्वारा गालियाँ देने से क्या होता है, जब तक मैं गालियाँ स्वीकार नहीं करता तो मेरे पर इसका कोई असर नहीं होगा. कुछ दिन पहले एक व्यक्ति ने मुझे कुछ उपहार दिया था, लेकिन मैंने उस उपहार को लेने से मना कर दिया तो वह व्यक्ति उपहार को वापस ले गया. जब मैं लूंगा ही नहीं तो कोई मुझे कैसे दे पाएगा. मैं स्वामी हूँ यानि मेरा मालिक मैं स्वयं हूँ. तुम्हारा दिया हुआ उपहार, गलियां आदि लूँ या नहीं लूँ ये मेरी मर्जी है.”

बुद्ध ने बड़ी विनम्रता से पूछा “अगर मैंने उपहार नहीं लिया तो उपहार देने वाला व्यक्ति क्या करेगा.”

भीड़ में से किसी ने कहा “उस उपहार को व्यक्ति अपने पास रखेगा.”

बुद्ध ने कहा “मुझे आप सब पर बड़ी दया आती है, क्योंकि मैं आपकी इन गालियों को लेने में असमर्थ हूँ; इसलिए आपकी यह गालियाँ आपके पास ही रह गयी है.”

मित्रों, हम भी अपने स्वामी स्वयं बनें. अपनी मर्जी के असली मालिक बनें. अगर गलियों के बदले हम प्रतिक्रिया में कुछ करेंगे, तो यह हम नहीं कर रहे हैं बल्कि सामने वाले ने हमें ऐसा करने के लिए मजबूर कर दिया है. अर्थात हम अपने मालिक नहीं रहे बल्कि अनजाने हम सामने वाले के हवाले हो गये. यानि हमने गालियां स्वीकार कर ली बदले में आलोचना शुरु कर दी. हमें ऐसे उपहार स्वीकार नहीं कर उसके पास ही रहने देना चाहिये. हम कर्कस और अनर्गल बातों का नोटिस (notice) न लें, तो जवाब में हम आलोचना करने से बच सकते हैं. आलोचना बूमरैंग (BOOMERANG) की तरह है. आलोचना के बदले में हमें और तीव्र आलोचना ही झेलनी पड़ेगी. हर व्यक्ति की प्रवृति अपने को ही सही मानने की होती है. इसके लिए वह जाने-अनजाने किसी भी हद तक चला जाता है. व्यक्तित्व विकास (स्वयं अपना स्वामी बनने) का अचूक फार्मूला है –  Buddha Personality Development Mantra आलोचना न करें.

आलोचना न करें !!! इस बूमरैंग से बचें !!!

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