शिवाजी और सिद्दी जौहर Great Sacrifices Story

∗शिवाजी और सिद्दी जौहर∗

(Shivaji Versus Siddi Jauhar)

 Shiva Kashid

— शिवाजी कासिद, पन्हालगढ़ —

1. अफजल खाँ की शिकस्त के बाद : छत्रपति शिवाजी महाराज ने अफजल खाँ को प्रतापगढ़ में मारने के बाद आदिलशाही में आक्रमण कर पन्हालगढ जैसे महत्त्वपूर्ण गढ़ पर कब्ज़ा कर लिया. तब आदिलशाह द्वितीय ने सिद्दी जौहर (Shivaji Versus Siddi Jauhar) को “सलाबत जंग”, खटाव प्रांत की सेना का “लश्कर सर हवालदार” (महाधिनायक), वाई प्रांत का दीवान (प्रधान) आदि उपाधियाँ और अधिकार दिये. और रुस्तुम जमान, अफजल खाँ के बेटे फाझल खान, सादात खान, भाई खान, सिद्दी मसूद, बड़े खान, बाजी घोरपडे, शृंगारपूर के सूर्याराव सुर्वे, वाडीकर सावंत, पाली के जसवंतराव दळवी, पीड नाईक जैसे प्रतिष्ठत सेना नायकों तथा लगभग 20 हजार अश्वदल, 35 हजार पैदल सैनिक, अनेक हाथियों, तोपों आदि के साथ बहुत बड़ा सैन्य बल देकर शिवाजी को समाप्त करने भेजा.

उस समय शिवाजी महाराज उस समय “मीरज” को घेरे हुए थे. उनको गुप्तचरों से सुचना मिली कि, ‘आदिलशाही सेना सिद्दी जौहर के नेतृत्व बिजापुर से और मुगल सेना शाइस्ता खाँ के नेतृत्व में शिवाजी को समाप्त करने आ रही है’. तो महाराज ने मीरज का घेरा छोड़, केवल 8000 पैदल सेनिक, 60 अश्वारोही सैनिकों के साथ 2 मार्च 1660 को सुरक्षा की दृष्टि से सुदृढ़ पन्हालगढ़ आ गये.

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2. सिद्दी जौहर ने पन्हालगढ़ पर घेरा : (Shivaji Versus Siddi Jauhar)

शिवाजी महाराजके पीछे-पीछे ही सिद्दी जौहर पन्हालगढ़ आ धमका. और गढ़ को चारों तरफ घेर लिया. पूर्व में फाझल खान, रुस्तुमे जमान तथा स्वयं जौहर, पश्चिम में सादातखान, भाईखान, सिद्दी मसूद, बाजी घोरपड़े तथा पीड नाईक घेर का नेतृत्व कर रहे थे. तथा शृंगारपुर के सूर्याराव सुर्वे और पाली के जसवंतराव दळवी इन दोनों को जौहर ने विशालशैल भेजा था. जो शेष बचे उन्होंने गढ़ के दक्षिण तथा उत्तर में घेरे की कमान संभाली. घेरा बहुत पक्का था. परंतु गढ़ भी बहुत सुदृढ़ था. फिर भी रात के अंधेरे में कभी-कभी मराठे गढ़ से उतरकर जौहर की सेना पर आक्रमण कर तुरंत गढ़ में घुस जाते थे. जौहर सेना के हाथ लगते थे. उधर शाइस्ता खाँ ने पूना पर अपना अधिकार कर लिया था.

शिवाजी को इस स्थिति में देखकर राजापुर के अंग्रेजी वखार का प्रमुख हेनरी रेव्हिंग्टन (English Major Henry Rewhingtn) भी जौहर के साथ मिल गया. उसने अफजल खाँ के प्रकरण में महाराज को उसने स्वराज्य के शत्रुओं को सहायता न करने का आश्वासन दिया था. परंतु अब स्थिति की नजाकत देख पाला बदल लिया. उसने अपने 400 पदाती, कुछ अश्वारोही तथा 5 पालकियां देकर दूत भेज दिया. जौहर को भी लंबी दूरी पर मार करने के लिए उनकी अधुनिक तोपों की आवश्यकता थी. रेव्हिंग्टन अपने साथी मिंघॅम, गिफर्ड, तथा वेलजी को साथ लेकर स्वयं जौहर की सहायता के लिए 2 अप्रेल को आ गया था.

3. शिवाजी महाराज की ऐसे हालात में गढ़ से निकलने की व्यूह रचना :

पन्हालगढ़ में शिवाजी को लगभग 4 मास हो गये. पूरा स्वराज्य चिंता में डूबा था. राजगढ़ पर मातोश्री जिजाऊ, सारे सेनानी, सैनिक ही नहीं प्रजा भी रात-दिन चिंतित रहने लगी. वो अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी महाराज को बचाना चाहते थे. आखिर महाराज के गुप्तचरों ने गढ़ से भागने का एक दुर्गम मार्ग ढूंढ ही लिया. परन्तु शत्रु भी इस बार अत्यधिक सावधान था.

महाराज ने अपने कुछ गिने-चुने लोगों से मंत्रणा कर एक साहसी व्यूह रचना तैयार की. सर्व प्रथम शत्रु को महाराज के समर्पण का सपना दिखाना और दुसरी तरफ गुप्तचरों के बताये मार्ग से विशालशैल को निकल जाना. परंतु यदि मार्ग में कहीं शत्रु से सामना हुआ तो? किसीने (ईश्वर जाने किसने) यह सुझाव दिया कि, “गढ़ में एक दूत (कासिद) है, जिसका नाम संयोग से ‘शिवा’ {न्हावी (नाभीक)} ही है. वह दिखने में महाराज जैसा ही दिखता था. उसकी दाढ़ी भी महाराज जैसी ही है. यदि उसकी वेशभूषा (मेकअप) महाराज जैसी करें, तो कोई भी धोखा खा सकता है. उसको शिवाजी की अनुकृति बनाकर संकट के समय में शत्रु को धोखा दे सकते हैं. शेष व्यवस्था का उत्तरदायित्त्व बाजी प्रभू ने अपने कंधेपर ले लिया और आषाढ पुर्णिमा की रात्रि गढ़ छोड़ना निश्चित किया.

शिवाजी महाराज ने स्वयं शिवा कासिद को बताया कि, “तुम्हें मेरी अनुकृति(प्रति) बनना है.” तो शिवा ने झट से महाराज के चरण पकड़े और बड़े आनंद व गर्व से कहा, “मेरा जीवन तो धन्य हो गया महाराज. यदि मेरे समर्पण से आप अर्थात स्वराज्य सुरक्षित हो सकता है, तो यह मेरे लिए विशेष गौरव बात है.” शिवा कासिद की बात सुनकर महाराज की आँखें भर आयी. उन्होंने उसे अपनी बाहों मे भर लिया और बोले, “शायद तुम्हारे प्राण संकट में पड़ सकते हैं.” शिवा कासिद ने कहा, “महाराज, आपको मां भवानी की सौगंध! अब आप अपना विचार मत बदलना. स्वामी, आप तथा स्वराज्य सुरक्षित रहता है, तो ऐसे लाखो शिवा इस पवित्र भूमि पर पैदा होंगे.”

शिवाजी महाराज ने उसे पूरी योजना बारीकी से समझायी. उसको अपने कपड़े दिये. शिवा ने कपड़ों को मस्तक के लगाया और पहन लिया. राजा ने अपने हाथों मुकुट पहनाया उसमे मोतियों का शिरोभूषण लगाया, कमर पर रत्न जड़ित कटार तथा तलवार, बांधी.

4.शिवाजी महाराज की व्यूह रचना की क्रियान्विति :

शिवाजी महाराज ने गंगाधर पंत पूछा, ”योजनानुसार सारा प्रबंध हो गया ?” पंत ने जौहर को लिखा पत्र पढ़कर सुनाया. ‘आप मेरे पितृतुल्य हैं, यदि मेरे अपराधों को क्षमा करके, मेरी सुरक्षा का वचन देते हैं, तो हम स्वयं आपसे मिलने आएंगे और जैसा आप कहेंगे, वैसा हम करेंगे.’ महाराज ने कहा, “बढ़िया! अब गढ़ पर भी यह बात फैलायी जाये कि, हम जौहर से मिलने जा रहें हैं.”

पत्र लेकर दुसरे दिन राजदूत गंगाधर पंत शत्रु से मिलने गये. जौहर ने पत्र बड़ी सावधानी से पढ़ा. जौहर ने पूछा, “राजा साहब कब यहां आयेंगे?” पंत बोले, “यदि आप सुरक्षा का दायित्त्व लेते हैं, तो महाराज कल रात्रि को आ सकते हैं.” यह सुनकर फाझल खाँ बोला, “अब्बा हुजुर से भी ऐसी ही बाते हुई थी.” जौहर बोला, “तुम्हारे अब्बा हुजुर शिवाजी से मिलने गये थे, यहां शिवाजी हमसे मिलने आ रहा है, यदि उसने कुछ दुःसाहस करने की कोशिश की तो अंजाम तुम जानते हो. परन्तु वह इतना बेवकूफ नहीं जो कुछ गलत हरकत कर बैठे.”

5. 12 जुलाई,1660 ई. की रात को : (Shivaji Versus Siddi Jauhar)

जौहर से मलने की तय तिथि से पूर्व की रात को यानि आषाढ़ पूर्णिमा (12 जुलाई,1660 ई.) की रात को ही शिवाजी महाराज की योजना अनुसार 10 बजे 600 सैनिकों को लेकर बहुत ही गोपनीयता के साथ दुर्ग से निकलकर विशालगढ़ की ओर जाना था. दुर्ग के अंदर कुल 6 हजार सैनिक थे. उनमें से बाजीप्रभु देशपांडे सहित चुने हुए 600 सैनिकों को साथ लेकर शिवाजी ने अपने महल के बाहर कदम रखा. साथ में एक और पालकी तथा 400 सैनिक गढ़ से निकल पड़े. सबसे आगे गुप्तचर बिना मशाल जलाए रास्ता दिखाते हुए घनघोर वर्षा में आगे था. दुर्ग का दरवाजा धीरे से खुला और फिर बंद हो गया. शिवाजी पूरे चार महीने व दस दिन बाद पन्हालगढ़ दुर्ग से बाहर निकले.

पुर्णिमा होते हुए भी चंद्रप्रकाश का कहीं नहीं था. वर्षा ऋतु के कारण प्रचंड मेघ गर्जना, तीव्र बवंडर, कड़कती बिजली और मुसलाधार वर्षा भी राजा के अनुकूल हो गयी. शवाजी महाराज के समर्पण की वार्ता से शत्रु के घेरे में कुछ शिथिलता आयी थी. गुप्तचर आगे चल रहे थे. धीरे-धीरे घेरा पार कर दिया. इतने में शत्रु के सैनिकों को कुछ आशंका हुई. वो चिल्लाये “ठहरो”; परंतु बाजी के सैनिकों ने वेग बढ़ाया. वहीं दुसरी पालकी और उसके साथ 400 सौ सैनिक उसी मार्ग पर दौड़ने लगे. जबकि महाराज की पालकी, बाजी तथा 600 सौ सैनिक दुसरे अति दुर्गम मार्ग से आगे बढे.

6. शिवाजी कासिद का महान आत्मबलिदान :

इधर शत्रु सैनिकों ने भागकर सिद्दी जौहर को सूचना दी कि, शिवाजी महाराज भाग गये. जौहर पर मानो पक्षाघात हो गया. कुछ क्षण वह पागलों की तरह बगलें झांकता रहा. फिर उसने चिल्लाकर महाराज का पीछा करने के लिए अपने दामाद सिद्दी मसूद को कहा. सैनिकों ने बताए मार्ग अनुसार सिद्दी मसूद अपने अश्वदल को लेकर दौडा. दूर पालकी दिखाई पड़ी. मसूद चिल्लाने लगा. “ठहरो! ठहरो!” कुछ ही पलों मे पालकी को घेर लिया. मसूद ने पूछा “पालकी में कौन है ?” कहार ने कहा “शिवाजी महाराज हैं!” “पर्दा उठाओ!” मसूद ने पालकी में बैठे शिवाजी को देखा और पालकी अपने कब्जे में ले ली. पालकी सिद्दी जौहर के शामियाने के सामने आयी. पालकी में से शिवाजी उतरकर अंदर चले आये. सिद्दी जौहर ने पूछा, “राजा साहब! भागकर जा रहे थे?” “हाँ, कोशिश अवश्य की.” “तो फिर क्या हुआ?” “सफलता नहीं मिली!” “राजा साहब आप बहादुर हैं. बैठिये!” शिवाजी को देखकर फाझल को बहुत क्रोध आ रहा था, इसने ही मेरे अब्बाजान को मारा और जौहर उसकी प्रसंशा कर रहा है. वह चिल्लाया जौहर, “तुम दुश्मन की प्रसंशा कर रहे हो? इसका तो सिर काट….” उससे भी अधिक तीखे स्वर में जौहर चिल्लाया “खामोश! यह तेरे मेरे जैसे मामुली सरदार नहीं. राजा हैं, इनका पैसला बादशहा सलामत करेंगे. राजा साहब मेरे मेहमान हैं. बैठिये राजा साहब!”

“धन्यवाद!” कहकर शिवाजी बैठ गए. “राजासाहब, अगर भाग जाते तो कहां जाते?” “विशालशैल! यदि एक बार हम वहां पहुंचते तो, आप कुछ नहीं कर सकते थे.” ‘‘बिलकुल सही! राजा साहब आपकी किस्मत की कमी पर हमें अफसोस है.” “हमारी किसमत हमेशा खराब नहीं होती!” “लेकिन आज तो ऐसा ही कहना पड़ेगा! हकीकत भी क्या दर्दनाक है!” शिवाजी हसकर बोले, “मां भवानी सब जानती है!” सिद्दीने पूछा, “अगर जंग में आप कत्ल कर दिये जाते तो?” शिवाजी खिलखिला कर हसे, अपनी बांयी मुट्ठी को कमर पर रखकर जौहर की दृष्टि से दृष्टि मिलाकर बोले ‘‘सिद्दी साहब!”

“शाहजी राजा को क्या आप भूल गए?” सिद्दी हस पड़ा. इतने में जौहर का एक सेवक (हेजीब) आगे आया और उसने उसके कान में कुछ कहा. जौहर चकित रह गया. अगले ही पल वह क्रोध से चिल्लाते हुए, तलवार लेकर शिवाजी के सामने आया. “तुम कौन हो?” “शिवाजी!” “झूठ! शिवाजी भाग गया. वास्तविक शिवाजी भाग गया!” “यह भी सच है.” “मतलब?” “क्या मतलब! वह शिवाजी राजा है. वह क्या तेरे हाथ आयेंगे?” “तुम कौन हो?” शिवा ने निर्भयता से जौहर की आँख से आँख मिलाकर बोला, “इस जीव को शिवा न्हावी (नाभीक) कहते हैं!” क्रोध से थरथराते हुए जौहर ने अपनी तलवार उसके छाती से लगाकर पूछा “इसका अंजाम जानते हो?” शिवा ने शांति से तलवार एक ओर करते हुए कहा, “अबे जा बे! मृत्यु तो महाराज के सैनिकों की दासी बनकर चरणों में पड़ी रहती है.” “हरामखोर” फाझल चिल्लाया.

शिवा हसते हुए बोला “फाझल, अब पछताए क्या होत, जब चिड़िया चुग गयी खेत!” झूटा ही सही; परंतु शिवाजी कासिद बन गया, स्वराज्य तथा अपने स्वामी का रक्षक, बोला “मेरा तो जन्म सफल हो गया.” “खामोश! कंबख्त!” जौहर चिल्लाया, और उसने अपनी तलवार सीधे शिवा की छाती के आरपार कर दी. इस अंतिम विदा के समय उस प्रति शिवाजी ने कहा, “महाराज, आपके नाम को कलंक ना लगे, इसलिए तलवार का प्रहार मैंने पीठ पर नहीं, अपनी छाती पर लिया है, मेरी अंतिम सेवा स्वीकार करें स्वामी!”

(कासिद शिवा का पद था. ‘कासिद’ शब्द फारसी है. जिसका अर्थ ‘दूत’ होता है.)

आज भी इस वीररत्न के वंशजों की पन्हाला तथा उसके परिसर में बस्ती है. महाराज ने उसकी समाधी पन्हालगढ पर बनवायी. गढ पर उसका चिरंतन स्मारक हो, इसलिए उसकी पूर्णाकृती प्रतिमा बनायी गयी. आज भी आषाढ तथा गुरु पुर्णिमा के दिन स्वामीभक्ति का, देशभक्ति का तथा समर्पण का उदाहरण बनी हुई है.

6. दूसरा बाजीप्रभु देशपांडे का अमर बलिदान :

Baaji prabhu

शिवा कासिद से धोखा खाने के बाद नये सिरे से शिवाजी का फिर पीछा शुरू किया. तब तक शिवाजी महाराज तीस मील पारकर चुके थे; पर विशालगढ़ अभी दूर था. इधर शत्रुओं के घोड़ों की पदचाप सुनायी देने लगी थी.

उस वक्त शिवाजी एक संकरी घाटी से गुजर रहे थे. अचानक बाजीप्रभु ने उनसे निवेदन किया कि मैं यहीं रुकता हूँ. आप तेजी से विशालगढ़ की ओर बढ़ें. जब तक आप वहाँ नहीं पहुँचेंगे, तब तक मैं शत्रु को पार नहीं होने दूँगा. शिवाजी के सामने असमंजस की स्थिति थी; पर सोच-विचार का समय नहीं था. आधे सैनिक बाजीप्रभु के साथ रह गये और आधे शिवाजी के साथ चले. निश्चय हुआ कि विशालगढ़ पहुँचने की सूचना तोप दागकर दी जाएगी.

घाटी के मुख पर बाजीप्रभु डट गये. कुछ ही देर में सिद्दी जौहर के दामाद सिद्दी मसूद के नेतृत्व में घुड़सवार वहाँ आ पहुँचे. उन्होंने दर्रे में घुसना चाहा; पर सिर पर कफन बाँधे हिन्दू सैनिक उनके सिर काटने लगे. भयानक संग्राम छिड़ गया. सूरज चढ़ आया; पर बाजीप्रभु ने उन्हें घाटी में घुसने नहीं दिया.

एक-एक कर बाजी के सैनिक धराशायी हो रहे थे. बाजीप्रभु भी सैकड़ों घाव खा चुके थे; पर उनके पास मरने के लिए समय नहीं था. उनके कान तोप की आवाज सुनने को आतुर थे. विशालगढ़ के द्वार पर भी शत्रु सेना का घेरा था. उन्हें काटते मारते शिवाजी किले में पहुँचे और तोप दागने का आदेश दिया. जै

से ही तोप की आवाज बाजीप्रभु के कानों ने सुनी, उधर उनकी घायल देह धरती पर गिरी. शिवाजी विशालगढ़ पहुँचकर अपने उस प्रिय मित्र की प्रतीक्षा ही करते रह गये; पर उसके प्राण तो लक्ष्य पूरा करते-करते अनन्त में विलीन हो चुके थे. बाजीप्रभु देशपाण्डे की साधना सफल हुई. तब से वह बलिदानी घाटी (खिण्ड) पावन खिण्ड कहलाती है.

शिवाजी को अदम्य साहस और सूझबूझ के लिए सदैव याद किये जायेंगे. साथ ही योजना बनाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका लिए गुप्तचर बहिर्जी नाइक को तथा सिद्दी जौहर से निपटने में बाजीप्रभु देशपांडे व शिवा न्हावी के शौर्य व अमर बलिदान को भी उतनी ही श्रद्धा से याद किया जायेगा.

जरुर पढ़ें : शिवाजी की जीवनी

संदर्भ : श्रीमान योगी – रणजित देसाई, मेहता पब्लिशिंग हाऊस, पुणे 411030 .श्री बाबासाहब उपाख्य ब.मो. पुरंदरे लिखित “राजा शिव छत्रपति”. Image – Google Image

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