गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ Buddha Teachings

∗गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ∗

(Buddha Teachings)

Buddha Teachings

मैं केवल एक ही पदार्थ सिखाता हूँ – दुःख है, दुःख का कारण है, दुःख का निरोध है, और दुःख के निरोध का मार्ग है.”

— गौतम बुद्ध

गौतम बुद्ध की शिक्षा (Buddha Teachings) मध्यम मार्ग की है. उन्होंने तृष्णा को दुःख का कारण बताया है. हमें तृष्णा व सही चाह में अन्तर को समझना जरूरी है. बुद्ध को भी सन्यासी बनकर लोगों के दुःख दूर करने की चाह थी. सही चाह के लिए प्रयासरत व्यक्ति को अपने राह मिल जाती है. इसीलिये कहा जाता है, “जहाँ चाह, वहाँ राह.” बुद्ध ने अपने द्वारा कही बात को भी आंख मीचकर भरोसा करने से मना किया. हम जिन दु:खों से पीड़ित है, उनमें बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे दु:खों का है, जिन्हें हमने अपने अज्ञान से पैदा कर लिया है. उन दु:खों से मुक्ति अपने सही ज्ञान द्वारा सम्भव है. किसीके आशीर्वाद या वरदान से उन्हें दूर नहीं किया जा सकता. सत्य का ज्ञान ही सम्यक ज्ञान है. अत: सत्य की खोज दु:ख मुक्ति के लिए परमावश्यक है. खोज अज्ञात सत्य की जा सकती है. बुद्ध ने अपने पूर्ववर्ती लोगों द्वारा या परम्परा द्वारा बताए सत्य को नकार दिया. अपने लिए नये सिरे से सत्य खोज की. बुद्ध स्वयं कहीं प्रतिबद्ध नहीं हुए और न ही अपने शिष्यों को उन्होंने कहीं बांधा. उन्होंने कहा कि, “मेरी बात को भी इसलिए चुपचाप न मान लो कि उसे बुद्ध ने कही है. उस पर भी सन्देह करो. परिक्षण करो. जीवन की कसौटी पर परखो. अपने अनुभवों से मिलान करो. यदि तुम्हें सही जान पड़े तो स्वीकार करो. अन्यथा छोड़ दो.” इसीलिये उनका धर्म रहस्याडम्बरों से मुक्त, मानवीय संवेदनाओं से युक्त एवं हृदय को सीधे छू लेता है.

बुद्ध की शिक्षाएँ :

बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति के 49 दिनों के बाद उनसे पढ़ाने के लिए अनुरोध किया गया था. इस अनुरोध के परिणामस्वरूप, योग से उठने के बाद बुद्ध ने धर्म के पहले चक्र को पढ़ाया था. इन शिक्षणों में चार आर्य सत्य और अन्य प्रवचन सूत्र शामिल थे. जो हीनयान और महायान के प्रमुख श्रोत हैं.

हीनयान शिक्षाओं में बुद्ध बताते हैं कि, कष्टों से छुटकारा पाने के लिए व्यक्ति को स्वयं ही प्रयास करना होगा. और महायान में वह बताते हैं कि दूसरों की खातिर पूर्ण ज्ञान, या बुद्धत्व कैसे प्राप्त कर सकते हैं. दोनों शाखाएँ एशिया में  सर्वप्रथम भारत और तत्पश्चात तिब्बत सहित आसपास के अन्य देशों में धीरे-धीरे विस्तारित होने लगी. अब ये पश्चिम में भी पनपने लगी हैं.

चार आर्य सत्य तथा अष्टांगिक मार्ग बौद्ध शिक्षाओं के मुख्य आधार हैं.

बुद्ध की मूल शिक्षाओं में चार आर्य सत्य निम्न हैं :

1. दुःख है : इस दुनिया में दुःख है. जन्म में, बूढे होने में, बीमारी में, मौत में, प्रियतम से दूर होने में, नापसंद चीज़ों के साथ में, चाहत को न पाने में, सब में दुःख है.

2. दुःख कारण है : तृष्णा दुःख का कारण है.

3. दुःख का निरोध है : तृष्णा से मुक्ति पाई जा सकती है.

4. दुःख निरोध का मार्ग है : तृष्णा से मुक्ति अष्टांगिक मार्ग के अनुसार जीने से पाई जा सकती है.

दुःख मुक्ति का अष्टांग मार्ग निम्नानुसार हैं :

1. सम्यक दृष्टि : चार आर्य सत्य में विश्वास करना.

2. सम्यक संकल्प : मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना.

3. सम्यक वाक : हानिकारक बातें और झूट न बोलना.

4. सम्यक कर्म : सही व उचित कर्म करना (हानिकारक कर्मों को न करना).

5. सम्यक जीविका : कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हानिकारक व्यापार न करना.

6. सम्यक प्रयास : अपने आप सुधरने की कोशिश करना.

7. सम्यक स्मृति : स्पष्ट ज्ञान से देखने की मानसिक योग्यता पाने की कोशिश करना.

8. सम्यक समाधि : निर्वाण पाना.

कुछ लोग आर्य अष्टांग मार्ग को पथ की तरह समझते है, जिसमें आगे बढ़ने के लिए, पिछले के स्तर को पाना आवश्यक है. लोगों को लगता है कि इस मार्ग के स्तर सब साथ-साथ पाए जाते है. अष्टांग मार्गों में तीन बुनियादी श्रेणियां में वर्गीकृत किया जाता है – समाधि स्कंद, प्रज्ञा स्कंद, शील स्कंद.

समाधि स्कंद – सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि

शील स्कंद – सम्यक वाक, सम्यक जीविका और सम्यक प्रयास

प्रज्ञा स्कंद – सम्यक दृष्टि (विचार), सम्यक कर्म और सम्यक संकल्प (विश्वास)

द्वितीय धर्मचक्र में समस्त धर्मों को समान रूप से नि:स्वभाव कहा गया है, जबकि इसका तृतीय धर्मचक्र में यह भेद किया गया है कि अमुक धर्म अमुक दृष्टि से नि:स्वभाव है और अमुक धर्म नि:स्वभाव नहीं, अपितु सस्वभाव है.

दस पारमिताओं (मुदिता, विमला, दीप्ति, अर्चिष्मती, सुदुर्जया, अभिमुखी, दूरंगमा, अचल, साधुमती, धम्म-मेघा) को प्राप्त कर लेते हैं तब “बुद्ध” कहलाते हैं. बुद्ध बनना ही बोधिसत्व के जीवन की पराकाष्ठा है. इस पहचान को बोधि (ज्ञान) नाम दिया गया है.

आधुनिक भारत में भारतीय संविधान के पिता डॉ. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर को बोधिसत्व कहते हैं.

बौद्ध धर्म का अन्तिम लक्ष्य है – “सम्पूर्ण मानव समाज की समानता और दुःख का अंत है.”

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