गौतम बुद्ध के प्रेरक प्रसंग Inspirational stories

∗गौतम बुद्ध के प्रेरक प्रसंग∗

(Buddha Prerak Prasang)

Gautama budha ke prerak prasang

Buddha Prerak Prasang – 1. तुम कब रुकोगे?

मगध राज्य में एक सोनापुर नाम का गाँव था. उस गाँव के लोग शाम होते ही अपने घरों में आ जाते थे. और सुबह होने से पहले कोई घर के बाहर कदम भी नहीं रखता था. इसका कारण एक खूंखार डाकू था.

डाकू मगध के जंगलों की गुफा में रहता था. वह लोगों को लूटता था और जान से भी मार देता था. लोगों को डराने के लिए वह जिसे भी मारता उसकी एक ऊँगली काट लेता और उन उँगलियों की माला बनाकर पहनता. इसलिए उसका नाम अंगुलिमाल पड़ा. गाँव के सभी लोग परेशान थे. इस डाकू के आतंक से छुटकारा चाहते थे.

एक दिन गौतम बुद्ध उस गाँव में आये. गाँव के लोग उनकी आवभगत करने लगे. गौतम बुद्ध ने देखा कि ‘गाँव के लोगों में किसी बात को लेकर दहशत फैली है.’

तब गौतम बुद्ध ने गाँव वालों से इसका कारण पूछा – गाँव वालों ने अंगुलिमाल के आतंक का पूरा किस्सा उन्हें सुनाया.

अगले ही दिन गौतम बुद्ध जंगल की तरफ निकल गये, गाँव वालों ने उन्हें बहुत रोका पर वो नहीं माने. बुद्ध को आते देख अंगुलिमाल हाथों में तलवार लेकर खड़ा हो गया, पर बुद्ध उसकी गुफा के सामने से निकल गए उन्होंने पलटकर भी नहीं देखा. अंगुलिमाल बुद्ध पीछे दौड़ा, पर दिव्य प्रभाव के कारण वो बुद्ध को  पकड़ नहीं पा रहा था.

थक हार कर उसने कहा, रुको.

बुद्ध रुक गए और मुस्कुराकर बोले, मैं तो कब का रुक गया पर तुम कब रुकोगे?”

अंगुलिमाल ने कहा, “सन्यासी तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता. सारा मगध मुझसे डरता है. तुम्हारे पास जो भी माल है निकाल दो वरना, जान से हाथ धो बैठोगे. मैं इस राज्य का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हूँ.”

बुद्ध जरा भी नहीं घबराये और बोले, “मैं ये कैसे मान लूँ कि तुम ही इस राज्य के सबसे शक्तिशाली इन्सान हो. तुम्हे ये साबित करके दिखाना होगा.”

अंगुलिमाल बोला बताओ, कैसे साबित करना होगा?”

बुद्ध ने कहा, तुम उस पेड़ से दस पत्तियां तोड़ कर लाओ.

अंगुलिमाल ने कहा, “बस इतनी सी बात, मैं तो पूरा पेड़ उखाड़ सकता हूँ.

अंगुलिमाल ने दस पत्तियां तोड़कर ला दी.

बुद्ध ने कहा, ”अब  इन पत्तियों को वापस पेड़ पर जाकर लगा दो.”

अंगुलिमाल ने हैरान होकर कहा, “टूटे हुए पत्ते कहीं वापस लगते हैं क्या ?

तो बुद्ध बोले, “जब तुम इतनी छोटी सी चीज़ को वापस नहीं जोड़ सकते तो तुम सबसे शक्तिशाली कैसे हुए?

“यदि तुम किसी चीज़ को जोड़ नहीं सकते तो कम से कम उसे तोड़ो मत. यदि किसी को जीवन नहीं दे सकते तो उसे मृत्यु देने का भी तुम्हे कोई अधिकार नहीं है. मैं तो ज्ञान प्राप्त कर सांसारिक बंधनो से मुक्त हो गया हूँ. लेकिन तुम यह लूटपाट और हत्या कब बंद करोगे? मैं तो कब का रुक गया पर तुम कब रुकोगे?”

ये सुनकर अंगुलीमाल को अपनी गलती का एहसास हो गया और वह बुद्ध का शिष्य बन गया और  उसी गाँव में रहकर लोगों की सेवा करने लगा.

आगे चलकर यही अंगुलिमाल बहुत बड़ा सन्यासी बना और अहिंसका के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

Buddha Prerak Prasang – 2. बीती तांहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय :

गौतम बुद्ध एक गाँव में उपदेश दे रहे थे. उन्होंने कहा कि हर किसी को धरती माता की तरह सहनशील तथा क्षमाशील होना चाहिए. क्रोध ऐसी आग है जिसमें क्रोध करनेवाला दूसरों को जलाएगा तथा खुद भी जल जाएगा.

सभा में सभी शान्ति से बुद्ध की वाणी सुन रहे थे, लेकिन वहाँ स्वभाव से ही अतिक्रोधी एक ऐसा व्यक्ति भी बैठा हुआ था. जिसे ये सारी बातें बेतुकी लग रही थी . वह कुछ देर ये सब सुनता रहा फिर अचानक ही आग- बबूला होकर बोलने लगा, “तुम पाखंडी हो. बड़ी-बड़ी बाते करना यही तुम्हारा काम है. तुम लोगों को भ्रमित कर रहे हो. तुम्हारी ये बातें आज के समय में कोई मायने नहीं रखती

ऐसे कई कटु वचन सुनकर भी बुद्ध शांत रहे. उसकी बातों से ना दुखी हुए, ना ही कोई प्रतिक्रिया की ; यह देखकर वह व्यक्ति और भी क्रोधित हो गया और वह बुद्ध के मुँह पर थूक कर वहाँ से चला गया.

अगले दिन जब उस व्यक्ति का क्रोध शांत हुआ तो उसे अपने बुरे व्यवहार के कारण पछतावे की आग में जलने लगा और वह उन्हें ढूंढते हुए उसी स्थान पर पहुंचा , पर बुद्ध कहाँ मिलते वह तो अपने शिष्यों के साथ पास वाले एक अन्य गाँव निकल चुके थे.

व्यक्ति ने बुद्ध के बारे में लोगों से पुछा और ढूंढते-ढूंढते जहाँ बुद्ध प्रवचन दे रहे थे वहाँ पहुँच गया. उन्हें देखते ही वह उनके चरणो में गिर पड़ा और बोला, “मुझे क्षमा कीजिए प्रभु!

बुद्ध ने पूछा : कौन हो भाई ? तुम्हे क्या हुआ है ? क्यों क्षमा मांग रहे हो ?”

उसने कहा, “क्या आप भूल गए. मैं वही हूँ जिसने कल आपके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया था. मै शर्मिन्दा हूँ. मै मेरे दुष्ट आचरण की क्षमायाचना करने आया हूँ.

भगवान बुद्ध ने प्रेमपूर्वक कहा, “बीता हुआ कल तो मैं वहीं छोड़कर आया गया और तुम अभी भी वहीं अटके हुए हो. तुम्हे अपनी गलती का आभास हो गया, तुमने पश्चाताप कर लिया; तुम निर्मल हो चुके हो; अब तुम आज में प्रवेश करो. बुरी बाते तथा बुरी घटनाएँ याद करते रहने से वर्तमान और भविष्य दोनों बिगड़ते जाते है. बीते हुए कल के कारण आज को मत बिगाड़ो.

उस व्यक्ति का सारा बोझ उतर गया. उसने भगवान बुद्ध के चरणों में पड़कर क्रोध त्यागका तथा क्षमाशीलता का संकल्प लिया; बुद्ध ने उसके मस्तिष्क पर आशीष का हाथ रखा. उस दिन से उसमें परिवर्तन आ गया, और उसके जीवन में सत्य, प्रेम व करुणा की धारा बहने लगी.

मित्रों , तुलसीदास जी ने बहुत सटीक कहा है बीती तांहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय. हम भूतकाल गलती के बारे में सोच कर दुखी होते और खुद को कोसते हैं. इससे समय के नाश के अलावा कुछ नहीं होता. इसलिए नए विचारों व नयी ऊर्जा के साथ वर्तमान सुधारें.

Buddha Prerak Prasang – 3. काश! मैं भी तुम्हें मीठा फल दे पाता :

गौतम बुद्ध किसी उपवन में विश्राम कर रहे थे. तभी बच्चों का एक झुंड आया और पेड़ पर पत्थर मारकर आम गिराने लगा. एक पत्थर बुद्ध के सर पर लगा और उस से खून बहने लगा. बुद्ध की आँखों में आंसू आ गये. बच्चों ने देखा तो भयभीत हो गये. उन्हें लगा कि अब बुद्ध उन्हें भला बुरा कहेंगे. बच्चों ने उनके चरण पकड़ लिए और उनसे क्षमा याचना करने लगे.

उनमे से एक बच्चे ने कहा,  “हमसे भारी भूल हो गई है. मेरी वजह से आपको पत्थर लगा और आपके आंसू आ गये. इस पर बुद्ध ने कहा“बच्चों, मैं इसलिए दुखी हूँ कि तुमने आम के पेड़ पर पत्थर मारा तो पेड़ ने बदले में तुम्हे मीठे फल दिए, लेकिन मुझे मारने पर मै तुम्हे सिर्फ भय दे सका. काश! मैं भी तुम्हें मीठा फल दे पाता.”

Buddha Prerak Prasang – 4. खुशहाल जीवन का रहस् :

एक बार बुद्ध से मलुक्यपुत्र ने पूछा, “भगवन आपने आज तक यह नहीं बताया कि मृत्यु के उपरान्त क्या होता है?

उसकी बात सुनकर बुद्ध मुस्कुराये, फिर उन्होंने उससे पूछा, “पहले मेरी एक बात का जबाव दो. अगर कोई व्यक्ति कहीं जा रहा हो और अचानक कहीं से आकर उसके शरीर में एक विषबुझा बाण घुस जाये तो उसे क्या करना चाहिए ? पहले शरीर में घुसे बाण को हटाना ठीक रहेगा या फिर देखना कि बाण किधर से आया है. और किसे लक्ष्य कर मारा गया है!”

मलुक्यपुत्र ने कहा, “पहले तो शरीर में घुसे बाण को तुरंत निकालना चाहिए, अन्यथा विष पूरे शरीर में फ़ैल जायेगा.”

बुद्ध ने कहा, “बिल्कुल ठीक कहा तुमने, अब यह बताओ कि पहले इस जीवन के दुखों के निवारण का उपाय किया जाये या मृत्यु के बाद की बातों के बारे में सोचा जाये.” मलुक्यपुत्र जिज्ञासा शांत हो गई.

मित्रों, बुद्ध ने वर्तमान जीवन की समस्याओं के समाधान को ही तर्कसंगत बताया है. और अनर्गल बातों के बारे सोचकर समय जाया करना निरर्थक. केवल वर्तमान में जियें. वर्तमान का समाधान ही सबकुछ है. केवल वर्तमान के बारे में सोचें यही खुशहाल जीवन का रहस् है.

Buddha Prerak Prasang – 5. बड़ी सोच, बड़ी उम्मीद, बड़ी झोली :

एक बार बुद्ध कहीं प्रवचन दे रहे थे. अपनी देशना ख़त्म करते हुए उन्होंने आखिर में कहा, जागो, समय हाथ से निकला जा रहा है. सभा विसर्जित होने के बाद उन्होंने अपने प्रिय शिष्य आनंद से कहा, चलो थोड़ी दूर घूम कर आते हैं. आनंद बुद्ध के साथ चल दिए. अभी वे विहार के मुख्य द्वार तक ही पहुंचे थे कि एक किनारे रुक कर खड़े हो गये. प्रवचन सुनने आये लोग एक एक कर बाहर निकल रहे थे, इसलिए भीड़ सी हो गई थी.

अचानक उसमे से निकल कर एक स्त्री गौतम बुद्ध से मिलने आयी. उसने कहा, “तथागत मैं नर्तकी हूँ. आज नगर के श्रेष्ठी के घर मेरे नृत्य का कार्यक्रम पहले से तय था, लेकिन मैं उसके बारे में भूल चुकी थी. आपने कहा, समय निकला जा रहा है तो मुझे तुरंत इस बात की याद आई. धन्यवाद तथागत!”

उसके बाद एक डकैत बुद्ध की ओर आया. उसने कहा, “तथागत मै आपसे कोई बात छिपाऊंगा नहीं. मै भूल गया था कि आज मुझे एक जगह डाका डालने जाना था कि आज उपदेश सुनते ही मुझे अपनी योजना याद आ गई. बहुत बहुत धन्यवाद!”

उसके जाने के बाद धीरे धीरे चलता हुआ एक बूढ़ा व्यक्ति बुद्ध के पास आया. वृद्ध ने कहा, “तथागत! जिन्दगी भर दुनियावी चीजों के पीछे भागता रहा. अब मौत का सामना करने का दिन नजदीक आता जा रहा है, तब मुझे लगता है कि सारी जिन्दगी यूँ ही बेकार हो गई. आपकी बातों से आज मेरी आँखें खुल गयी. आज से मैं अपने सारे दुनियावी मोह छोड़कर निर्वाण के लिए कोशिश करना चाहता हूँ.”

जब सब लोग चले गये तो बुद्ध ने कहा, देखो आनंद! प्रवचन मैंने एक ही दिया, लेकिन उसका हर किसी ने अलग अलग मतलब निकाला. जिसकी जितनी झोली होती है, उतना ही दान वह समेट पाता है. निर्वाण प्राप्ति के लिए भी मन की झोली को उसके लायक होना होता है. इसके लिए मन का साफ़ होना बहुत जरुरी है.

मित्रों, यहाँ बुद्ध का तात्पर्य यही है कि, अपने आप को पूर्ववर्ती भावनाओं में बांध कर न रखें, दिमाग को खुला रखें, बड़ी सोच व बड़ी उम्मीद के साथ लेने के लिये भी झोली बड़ी रखें.

Buddha Prerak Prasang – 6. हकीकत को धैर्य से स्वीकारना ही सहज ज्ञान :

एक स्त्री का एक ही बेटा था, वह भी मर गया. रोती-बिलखती वह गौतम बुद्ध के पास पहुंची और उनके पैरों में गिरकर बोली, महत्मा जी, आप किसी तरह मेरे लाल को जीवित कर दें.

महत्मा बुद्ध ने उसके प्रति सहानुभूति जताते हुए कहा, “तुम शोक मत करो.बुद्ध ने उस महिला के सच बोलने की सराहना करते हुए कहा, “मैं तुम्हारे बेटे को जीवित कर दूंगा. पर इसके लिए तुम्हें किसी ऐसे घर से भिक्षा के रूप में कुछ लाना होगा जहाँ किसी व्यक्ति की कभी मृत्यु न हुई हो.

उस स्त्री को कुछ तसल्ली हुई और दौड़कर गाँव पहुंची. अब वह ऐसा घर खोजने लगी जहाँ किसी की मृत्यु न हुई हो. बहुत ढूंढा लेकिन ऐसा कोई घर उसे नहीं मिला. वह निराश होकर महात्मा बुध्द के पास आई और वस्तुस्थिति से अवगत कराया.

तब बुद्ध बोले, “यह संसार-चक्र है. यहाँ जो आता है. उसे एक दिन अवश्य ही जाना पड़ता है. तुम्हें इस दुःख को धैर्य से सहन करना चाहिए”. महिला समझ गयी कि, ‘हकीकत को धैर्य से स्वीकारना ही सहज ज्ञान है.’

Buddha Prerak Prasang – 7. मन में विश्वास के बीज बोओ : 

एक दिन एक किसान बुद्ध के पास आया और बोला, “महाराज, मैं एक साधारण किसान हूँ. बीज बोकर, हल चला कर अनाज उत्पन्न करता हूँ. और तब उसे ग्रहण करता हूँ. किंतु इससे मेरे मन को तसल्ली नहीं मिलती. मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूँ, जिससे मेरे खेत में अमरत्व के फल उत्पन्न हों. आप मुझे मार्गदर्शन दीजिए जिससे मेरे खेत में अमरत्व के फल उत्पन्न होने लगें.”

बात सुनकर बुद्ध मुस्कराकर बोले, “भले व्यक्ति, तुम्हें अमरत्व का फल तो अवश्य मिल सकता है किंतु इसके लिए तुम्हें खेत में बीज न बोकर अपने मन में बीज बोने होंगे?

यह सुनकर किसान हैरानी से बोला, “प्रभु, आप यह क्या कह रहे हैं? भला मन में बीज बोकर भी फल प्राप्त हो सकते हैं.”

बुद्ध बोले, “बिल्कुल हो सकते हैं और इन बीजों से तुम्हें जो फल प्राप्त होंगे वे वाकई साधारण न होकर अद्भुत होंगे जो तुम्हारे जीवन को भी सफल बनाएंगे और तुम्हें नेकी की राह दिखाएंगे.”

किसान ने कहा, “प्रभु, तब तो मुझे अवश्य बताइए कि मैं मन में बीज कैसे बोऊं?

बुद्ध बोले, “तुम मन में विश्वास के बीज बोओ, विवेक का हल चलाओ, ज्ञान के जल से उसे सींचो और उसमें नम्रता का उर्वरक डालो. इससे तुम्हें अमरत्व का फल प्राप्त होगा. उसे खाकर तुम्हारे सारे दु:ख दूर हो जाएंगे और तुम्हें असीम शांति का अनुभव होगा.”

बुद्ध से अमरत्व के फल की प्राप्ति की बात सुनकर किसान की आंखें खुल गयी. वह समझ गया कि अमरत्व का फल सद्विचारों के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है.

मित्रों, कोई भी कार्य में सिद्धि तभी होगी जब वह कार्य विश्वास व ज्ञान के साथ विवेक से नम्रता पूर्वक करेंगे. इसको अमरत्व का फल भी कह सकतें हैं. किसी न किसी तरह यही दूर-दूर तक आपकी कीर्ति का रास्ता है.

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