शिवाजी का आगरा जेल से फलों की टोकरियों में निकलना Wisdom Story

∗शिवाजी का आगरा जेल से फलों की टोकरियों में निकलना∗

(Shivaji escape from Agra jail)

 shivaji from agra jail

शिवाजी महाराज को समाप्त में अफजल खाँ, सिद्दी जौहरऔरंगजेब के मामा शाइस्ता खाँ के अभियान फ़ैल हो जाने पश्चात चौथा अभियान आगरा किले की जेल में रचा गया.

बहिर्जी नाईक की गुप्तचर सूचनाओं के आधार पर आमजन को परेशानी में डाले बिना सूरत में शिवाजी की सफल लूट से औरंगजेब का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया. इससे खिन्न होकर औरंगजेब ने इनायत खाँ के स्थान पर गयासुद्दीन खां को सूरत का फौजदार नियुक्त किया. और शहजादा मुअज्जम तथा उपसेनापति राजा जसवंत सिंह की जगह दिलेर खाँ और राजा जयसिंह की नियुक्ति की गई. राजा जयसिंह ने बीजापुर के सुल्तान, यूरोपीय शक्तियाँ तथा छोटे दक्षिणी सामंतों का सहयोग लेकर शिवाजी पर आक्रमण कर दिया. जयसिंह ने शिवाजी के भागने के सारे रास्ते बन्द कर दिये. चारों ओर से घिर जाने पर शिवा जी को अंतत: 22 जून 1665 को पुरन्दर की संधि करनी पड़ी.

पुरन्दर की संधि की शर्तें :

1. इस संधि के मुताबिक शिवाजी 23 दुर्ग मुगलों को दे देंगे. इन 23 दुर्गों से 4 लाख हूण सालाना आमदनी होती थी.

2. शेष केवल 12 दुर्ग उनके पास रहेंगे. बालाघाट और कोंकण के क्षेत्र शिवाजी को मिलेंगे, पर उन्हें इसके बदले में 13 किस्तों में 40 लाख हूण अदा करने होंगे.

3. इसके अलावा शिवाजी प्रतिवर्ष 5 लाख हूण का अतिरिक्त राजस्व भी देंगे.

4. शिवाजी स्वयं औरंगजेब के दरबार में से मुक्त रहेंगे पर उनके पुत्र शम्भाजी को मुगल दरबार में खिदमत करनी होगी.

5. बीजापुर के खिलाफ शिवाजी मुगलों का साथ देंगे.

पुरन्दर की संधि बाद शिवाजी को आगरा बुलाया गया. राजा जयसिंह के पुत्र रामसिंह ने शिवाजी की सुरक्षा और सम्मान की गारंटी ली. इसके उपरांत 1666 ई० में शिवा जी आगरा पहुँचे. दरबार में इन्हें इनके पुत्र के साथ 5000 का मनसब दिया गया. जिससे शिवाजी नाराज हो गये. छत्रपति शिवाजी व उनके पुत्र को औरंगजेब ने धोखा देकर  कैद कर लिया था. उन्हें आगरा के किले में कैद रखा गया था. उनपर 5000 सैनिकों के पहरे पर लगा दिया. कुछ ही दिनों बाद 18 अगस्त 1666 को औरंगजेब का राजा शिवाजी को मार डालने का इरादा था.

jail in Agra fort

Jail in Agra Fort

शिवाजी का फलों की टोकरी में छुपकर कर आगरा जेल से भागना :

समर्थ गुरु रामदास की योजना के मुताबिक, औरंगजेब को भेंट के तौर पर फलों की टोकरियां भिजवाई जाती थीं.  गुरूजी ने भी ये सिलसिला अपने एक भक्त के जरिए शुरू कराया था. मुगल सेना का विश्वास जीतने के बाद उस भक्त ने 17 अगस्त 1666 को दो बड़ी और कवर्ड टोकरियां भेजी. टोकरियों खाली होने के बाद शिवाजी ने अपने हमशक्ल हीरो जी फरजन्द को अपनी जगह लिटाया, और अपने पुत्र के साथ इन टोकरियों में छुपकर भाग निकले.

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सम्भाजी को मथुरा में एक विश्वासी ब्राह्मण के यहाँ छोड़ा. और शिवाजी बनारस, गया, पुरी होते हुए 2 सितम्बर 1666 को सकुशल रायगढ़ पहुँच गये. इससे मराठों को नवजीवन मिल गया. औरंगजेब ने जयसिंह पर शक करके उसकी हत्या विष देकर करवा दी. जसवंत सिंह के द्वारा पहल करने के बाद सन् 1668 में शिवाजी ने मुगलों के साथ दूसरी बार संधि की. औरंगजेब को शिवाजी को राजा की मान्यता देनी पड़ी. और शिवाजी के पुत्र संभाजी को 5000 की मनसबदारी दी. शिवाजी को पूना, चाकन और सूपा का जिला लौटा दिया गया. पर सिंहगढ़ और पुरन्दर पर मुगलों का अधिपत्य बना रहा.

शिवाजी का अदम्य साहस और सूझबूझ हमें झकझोर देती है. शिवाजी के साहस और सूझबूझ भरे कारनामे हमारी प्रेरणा के श्रोत हैं.

shivaji फलों की टोकरियों में छुपकर भाग निकलना

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