शिवाजी के प्रेरक प्रसंग Prerak prasang Shivaji

∗शिवाजी के प्रेरक प्रसंग∗

shivaji maharaj

शिवाजी जन्म जयंती 19 फ़रवरी – पुण्य तिथि 3 अप्रैल.

1. शिवाजी का अनिंद्य सुन्दरी गौहर बानू के प्रति असीम सम्मान

जब शिवाजी ने 1659 ई. के अंत में कल्याण दुर्ग पर विजय प्राप्त की. तत्कालीन परंपरा के अनुसार विजेता का अधिकार विजित की महिलाओं पर भी होता था. गौहर बानू सुन्दरता की प्रतिमूर्ति थी. उनके सेनापति आवाजी सोनदेव ने कल्याण के परास्त मुस्लिम सूबेदार की अनिंद्य सुन्दर पुत्रवधू गौहर बानू को बंदी बनाकर शिवाजी सेवा में प्रस्तुत किया.

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तब पहले तो शिवा जी ने अपनी व अपने सूबेदार सोनदेव की ओर से गौहर बानू से क्षमा माँगी. पर शिवाजी ने गौहर बानू को देखा तो, वह उसकी सुंदरता की तारीफ किए बिना नहीं रह सके. उन्होंने उसकी तारीफ में कहा, “काश मेरी माँ भी आपकी तरह सुन्दर होती तो मैं भी इतना ही सुन्दर होता.”

और उन्होंने उनको मुक्त कर ससम्मान उनके परिवार के पास भेज दिया. साथ ही उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि वह दूसरे की बहू-बेटियों को अपनी माता की तरह मानते हैं. नारी के प्रति उनके दिल में असीम सम्मान था.

मित्रों, इस घटना से केवल हिन्दू ही नहीं मुसलमान भी शवाजी के चरित्र के कायल हो गये थे. सेक्स और पैसा व्यक्ति की सबसे बड़ी कमजोरी है. इतिहास में सेक्स पर कंट्रोल के दो दृष्टान्त मिलते हैं. एक शिवाजी का और दूसरा तुलसीदासजी का. इनके आलावा गाँधी जी को छोड़कर अन्य उदाहरण हो तो आप कमेंट बॉक्स में जरुर लिखें.

2. शिवाजी के अनूठे साहस की एक मिसाल

पुणे के नजदीक नचनी गाँव में एक आदमखोर चीते का आतंक छाया हुआ था. वह अचानक गाँव में हमला करके जंगल में जाकर ओझल हो जाता था. डरे हुए गाँव वाले अपनी इस समस्या लेकर शिवाजी के पास पहुँचे.

और उन्होंने अपनी व्यथा सुनाई, “हमें उस खतरनाक चीते से बचाइये. वह ना जाने कितने बच्चों को मार चुका है, ज्यादातर वह हम सब सो रहे होते हैं, तब हमला करता है.”

शिवाजी ने धैर्यपूर्वक ग्रामीणों को सुना और आश्वस्त किया,आप लोग चिंता मत करिये, मैं यहाँ आपकी मदद करने के लिए ही हूँ .

शिवाजी अपने साथ यसजी और कुछ सैनिकों लेकर जंगल में चीते को मारने के लिए निकल पड़े . बहुत ढूँढने के बाद जैसे ही वह सामने आया, सैनिक डर कर पीछे हट गये, पर शिवाजी और यसजी बिना डरे उस पर टूट पड़े और पलक झपकते ही उसे मार गिराया. गाँव वाले खुश हो गये और शिवाजी की जयजयकार करने लगे.

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3. शिवाजी की समर्थ गुरु रामदास के प्रति असीम श्रद्धा

छत्रपति शिवाजी के गुरुदेव, समर्थ गुरु रामदास एक दिन गुरु भिक्षा लेने जा रहे थे. उन पर शिवाजी की नजर पड़ते ही प्रणाम कर निवेदन किया, “हे गुरदेव! मैं अपना पूरा राज-पाट आपके कटोरे में डाल रहा हूँ! अब से मेरा राज्य आपका हुआ!

तब गुरु रामदास ने कहा, सच्चे मन से दे रहे हो! वापस लेने की इच्छा तो नहीं?”

बिलकुल नहीं! यह सारा राज्य आपका हुआ!

तो ठीक है! यह लो!” कहते कहते गुरु ने अपना भगवां चोला फाड़ दिया! उसमे से एक टुकडा निकाला और शिवाजी के मुकुट पर बाँध दिया. और कहा, लो! मैं अपना राज्य तुम्हे सौंपता हूँ. इसे चलाने और देखभाल के लिए. मेरे नाम पर राज्य करो! मेरी धरोहर समझ कर! मेरी तुम्हारे पास अमानत रहेगी.

गुरदेव! आप तो मेरी भेंट लौटा रहें हैं.कहते कहते शिवाजी की ऑंखें गीली हो गयी.

ऐसा नहीं! कहा न मेरी अमानत है. मेरे नाम पर राज्य करो. इसे धर्म राज्य बनाये रखना, यही मेरी इच्छा है.

ठीक है गुरुदेव! इस राज्य का झंडा सदा भगवे रंग का रहेगा! इसे देखकर आपकी तथा आपके आदर्शों की याद आती रहेगी.

सदा सुखी रहो! कहकर गुरु रामदास भिक्षा हेतु चले दिए!

शिवाजी का समर्थ गुरु रामदास को राज्य समर्पित करना, बदले गुरु में द्वारा वापस राज्य सौंपना एक दुसरे प्रति असीम श्रद्धा व अगाध प्रेम द्योतक है.

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4. शिवाजी की न्याय प्रियता

एक बार शिवाजी के समक्ष उनके सैनिक किसी गांव के मुखिया को पकड़ कर लाए. मुखिया बड़ी और घनी मूछों वाला रसूखदार व्यक्ति था. लेकिन उस पर एक विधवा की इज्जत लूटने का आरोप साबित हो चुका था.

यह घटना उस समय की है, जब शिवाजी मात्र चौदह साल के थे. शिवाजी बड़े ही बहादुर, निडर और न्यायप्रिय थे. और खास तौर पर उनके मन में महिलाओं के प्रति असीम सम्मान था.

उन्होंने तत्काल अपना निर्णय सुनाया और कहा, “इसके दोनों हाथ और पैर काट दो, ऐसे जघन्य अपराध के लिए इससे कम कोई सजा नहीं हो सकती.”

छत्रपति शिवाजी महाराज जीवनपर्यंत साहसिक कार्य करते रहे और हमेशा गरीब, बेसहारा लोगों को प्रेम और सम्मान के साथ न्याय देते रहे.

5. शिवाजी की निडरता

शिवाजी महाराज के पिता शाहजी बीजापुर के सुलतान के समान्त थे. वह अक्सर युद्ध लड़ने के लिए घर से दूर रहते थे. इसलिए उन्हें शिवाजी के निडर और पराक्रमी होने का सही अंदाज नहीं था.

एक बार वे शिवाजी को बीजापुर के सुलतान के दरबार में ले गए. शाहजी ने तीन बार झुक कर सुलतान को सलाम किया, और शिवाजी से भी ऐसा ही करने को कहा. लेकिन, शिवाजी अपना सिर ऊपर उठाए सीधे खड़े रहे.

एक विदेशी शासक के सामने वह किसी भी कीमत पर सिर झुकाने को तैयार नहीं हुए. इतना ही नहीं किसी शेर की तरह शान से चलते हुए दरबार से वापस चले गए. शिवाजी से ऐसी निडरता की उम्मीद किसी को नहीं थी. वही निडर बालक बड़ा होकर एक कुशल और प्रबुद्ध राजा बना और उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज के रूप में जाना जाता है.

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6. शिवाजी की अग्नि परीक्षा : सिंहनी का दूध

समर्थ गुरु रामदास स्वामी अपने शिष्यों में सबसे अधिक स्नेह छत्रपति शिवाजी महाराज से करते थे. शिष्य सोचते थे कि, ‘शिवाजी उनके राजा होने के कारण ही अधिक प्रेम हैं.’ समर्थ ने शिष्यों का भ्रम दूर करने के बार में विचार किया.

एक दिन वे शिवाजी सहित अपनी शिष्य मंडली के साथ जंगल से जा रहे थे. रात्रि होने पर उन्होंने समीप की एक गुफा में जाकर डेरा डाला. सभी वहां लेट गये, किंतु थोड़ी ही देर में रामदास स्वामी के कराहने की आवाजें आने लगीं. शिष्यों ने कराहने का कारण पूछा, तो उन्होंने कहा, “मेरे पेट में दर्द है.”

सभी शिष्य चुप रहे पर शिवाजी ने पूछा, “क्या इस दर्द को दूर करने की कोई दवा है.”

गुरुजी बोले, “एक मात्र सिंहनी का दूध ही मेरे पेट के दर्द को दूर कर सकता है.”

शिवाजी ने सुना, तो गुरुदेव का तुम्बा उठाकर सिंहनी की खोज में निकल पड़े. कुछ ही देर में उन्हें एक गुफा में सिंहनी की गर्जना सुनाई दी. वे वहां गए, तो देखा कि एक सिंहनी शावकों को दूध पिला रही थी.

शिवाजी उस सिंहनी के पास गए, और उन्होंने कहा, ”मां मैं तुम्हें मारने या तुम्हारे इन छोटे-छोटे शावकों को लेने नहीं आया हूँ. मेरे गुरुदेव अस्वस्थ हैं और उन्हें तुम्हारे दूध की आवश्यकता है. उनके स्वस्थ होने पर यदि तुम चाहो तो मुझे खा सकती हो.”

शिवाजी की गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा एवम् गुरु के सच्चे आशीर्वाद के आगे सिंहनी ने भी हथियार डाल दिये. और सिंहनी शिवाजी के पैरों को चाटने लगी. तब शिवाजी ने सिंहनी का दूध निचोड़ कर तुम्बा भर लिया और प्रणाम कर वह स्वामी जी के पास पहुंचे.

सिंहनी का दूध लाया देख समर्थ बोले, धन्य हो शिवा. आखिर तुम सिंहनी का दूध ले ही आए. उन्होंने अपने और शिष्यों से कहा, “मैं तो तुम सभी की परीक्षा ले रहा था.”

पेट दर्द तो एक बहाना था. गुरुजी ने शिवाजी से कहा, “तुम्हारे जैसा शूरवीर शिष्य जिसके साथ हो उसे कोई विपदा छू ही नहीं सकती.

मित्रों, ऐसी अग्नि परीक्षा शिवाजी के अलावा शायद ही किसी ने अपने गुरु के लिए दी होगी. अपने कर्तव्य के प्रति सच्ची निष्ठा रखने वाले की ईश्वर भी मदद करता है.

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7. स्वयं को खतरे में डालकर गरीब की मदद

उन दिनों शिवाजी मुगल सेना से बचने के लिए वेश बदलकर रहते थे. इसी क्रम में एक दिन शिवाजी एक दरिद्र ब्राह्मण के घर रुके. ब्राह्मण का नाम विनायक देव था. वह अपनी मां के साथ रहता था. विनायक भिक्षावृत्ति कर अपना जीवन-यापन करता था.

अत्यधिक निर्धनता के बावजूद उसने शिवाजी का यथाशक्ति सत्कार किया. एक दिन जब वह भिक्षाटन के लिए निकला तो शाम तक उसके पास बहुत ही कम अन्न एकत्रित हो पाया. वह घर गया और भोजन बनाकर शिवाजी और अपनी मां को खिला दिया. वह स्वयं भूखा ही रहा. शिवाजी को अपने आश्रयदाता की यह दरिद्रता भीतर तक हिला गई. उन्होंने सोचा कि किसी तरह उसकी मदद की जाए.

शिवाजी ने उसी समय विनायक की दरिद्रता दूर करने का दूसरा उपाय सोचा. उन्होंने एक पत्र वहां के मुगल सूबेदार को भिजवाया. पत्र में लिखा था कि शिवाजी इस ब्राह्मण के घर रुके हैं. अत: उन्हें पकड़ लें और इस सूचना के लिए इस ब्राह्मण को दो हजार अशर्फियां दे दें. सूबेदार शिवाजी की चरित्रगत ईमानदारी और बड़प्पन को जानता था. अत: उसने विनायक को दो हजार अशर्फियां दे दी और शिवाजी को गिरफ्तार कर लिया.

बाद में तानाजी से यह सुनकर कि उसके अतिथि और कोई नहीं स्वयं शिवाजी महाराज थे. तब विनायक छाती पीट-पीटकर रोने लगा और मूर्छित हो गया. तब तानाजी ने उसे सांत्वना दी और बीच मार्ग में ही सूबेदार से संघर्ष कर शिवाजी को मुक्त करा लिया.

शिवाजी महाराज ने विनायक की दरिद्रता दूर करने के लिये अपने को मुगल सेना के हवाले कर अपने प्राण संकट में डाल दे. ऐसे आदर्श राजा विरले ही होते हैं.

8. शिवाजी की सहनशीलता

एक बार छत्रपति शिवाजी महाराज जंगल में शिकार करने जा रहे थे. अभी वे कुछ दूर ही आगे बढे थे कि, एक पत्थर आकर उनके पर गिरा. शिवाजी क्रोध में इधर-उधर देखने लगे, पर उन्हें कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था, तभी पेड़ों के पीछे से एक बुढ़िया सामने आई और बोली, “ये पत्थर मैंने फेंका था.

शिवाजी ने पुछा, आपने ऐसा क्यों किया ?”

बुढ़िया बोली, क्षमा कीजियेगा महाराज, मैं तो आम के इस पेड़ से कुछ आम तोड़ना चाहती थी, पर बूढी होने के कारण मैं इस पर चढ़ नहीं सकती इसलिए पत्थर मारकर फल तोड़ रही थी, गलती से वो पत्थर आपके लग गया.

निश्चित ही कोई साधारण व्यक्ति ऐसी गलती से क्रोधित हो उठता और गलती करने वाले को सजा देता, पर शिवाजी तो महानता के प्रतीक थे, भला वे ऐसा कैसे करते.

उन्होंने सोचा, यदि यह एक पेड़ इतना सहनशील हो सकता है, जो की मारने वाले को भी मीठे फल देता है; तो मैं एक राजा हो कर सहनशील क्यों नहीं हो सकता हूँ?”

ऐसा ही सोचते हुए उन्होंने बुढ़िया को कुछ मुद्रा भेंट की और वहां से चल दिये.

शिवाजी की जीवनी जरुर पढ़ें.

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